नई दिल्लीः प्रवर्तन निदेशालय द्वारा बेंगलुरू स्थित विजय माल्या के किंगफिशर टावर्स में फ्लैट खरीदने पर दर्ज किए गए केस से जुड़े एक मामले में प्रवेन्शन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत दर्ज मामलों में अपीलीय न्यायाधिकरण ने फैसला सुनाया है जिसमें याचिकाकर्ताओं किरण मजूमदार और विवेक माथीस को क्लीन चिट दी है जिसमें कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं और विजय माल्या में किसी तरह का संबंध नहीं है. इसके साथ ही ट्रिब्यूनल ने फ्लैट खरीददारों के अधिकारों और उन पर लागू होने वाले कानूनों को भी स्पष्ट किया है जिसमें कहा गया है कि पीएमएलए के तहत जब्त की गई संपत्ति को फिर से प्राप्त कर सकते हैं.

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम के तहत 2016 में विजय माल्या और अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था. जिसमें ईडी का कहना था कि किंगफिशर टावर्स में कुछ लोगों ने फ्लैट खरीद कर विजय माल्या की मनी लॉन्ड्रिंग में मदद की है. जिसमें किरण मजूमदार और विवेक माथीस दोनों ने 2012 में किंगफिशर टावर्स के कुछ फ्लैट खरीदे थे. जिसके बाद ईडी ने इन दोनों पर मनी लॉन्ड्रिंग का केस कर रखा है. जिसके बाद विवेक माथीस और किरण मजूमदार अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष अपीलकर्ता बने हैं.

इस मामले में याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि उन्हें ट्रिब्युनल के समक्ष अपना पक्ष रखने का एक भी मौका नहीं दिया गया. जिसमें ये मामला प्रवर्तन निदेशालय के आदेश की जांच और उसकी पुष्टि के मामले से जुड़ा हुआ है. सुनवाई के दौरान माथीस और मजूमदार के वकील अर्धदीप सिंह ने ट्रिब्युनल के समक्ष किंगफिशर टावर्स के याचिकाकर्ताओं के जब्त फ्लैटों को छोड़ने की मांग की है.

प्रवर्तन निदेशालय का आरोप था कि मजूमदार और माथीस दोनों की शराब कारोबारी विजय माल्या के दोस्त हैं और इन्होंने बेंगलुरू के किंगफिशर टावर्स में फ्लैट खरीदकर माल्या की मनी लॉन्ड्रिंग में मदद की थी. जिसपर सुनवाई के दौरान मजूमदार के वकील ने कहा कि फ्लैट खरीदने और मनी-लॉन्ड्रिंग के बीच कोई भी संबंध नहीं है. उन्होंने कहा, फ्लैटों को खरीदने के लिए जिस पैसे का इस्तेमाल किया गया है वो उनके पर्सनल अकाउंट से निकाला गाय है और जिसके सभी जरूरी दस्तावेज मौजूद हैं.

मामले पर सुनवाई के बाद अपीलीय न्यायाधिकरण ने याचिकाकर्ताओं किरन मजूमदार और विवेक माथीस को क्लीन चिट दी है और कहा है कि शराब कारोबारी विजय माल्या के साथ इनका कोई संबंध नहीं है. ट्रिब्युनल का इस केस में अब तक का ये सबसे बड़ा निर्णय लिया गया है जिससे प्रवर्तन निदेशालय द्वारा दर्ज किए गए दूसरे मामलों में भी राहत मिलने की उम्मीद है.

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