वक्त सच और झूठ को पहचाने का है, क्योंकि झूठ ने हमारा इतना कुछ छीना है कि हम बरबादी के मुकाम पर आ गये हैं। ऐसे में गोपाल दास नीरज की कुछ पंक्तियां “किया जाए नेता यहां, अच्छा वही शुमार, सच कहकर, जो झूठ को देता गले उतार”। समीचीन हैं। बात शीशे की तरह साफ है, जब झूठ और सच की ठंडाई में आस्थाओं की भांग परोसी गई थी, तब हम सबने इसे मन भर पिया। नतीजतन, भूल गये कि क्या सच था और क्या झूठ। हाल यह हुआ कि जब गले के नीचे उतरी तो न यहां के रहे और न वहां के। कमोबेश इसी हाल में देशवासी अब जीने को मजबूर हैं। हम सच और झूठ, विकास और विनाश में अंतर नहीं कर पा रहे।

नशा यूं चढ़ा है कि गर्त में पहुंचने के बाद भी, अपने बच्चों के भविष्य की नहीं सोच रहे। अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई में हम दिनरात एक किये हैं। ये हालात देखकर नीरज जी की कुछ और पंक्तियां याद आती हैं, “है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए, जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए। रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह, अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए”। अगर हम इन पंक्तियों से कुछ सबक न ले सके, तो इतनी देर हो जाएगी कि हम फिर राजशाही की तरह कारपोरेट घरानों की गुलामी करेंगे और हमारे घरों में गुलाम पैदा हुआ करेंगे।

सच को देखना है, तो इतिहास के मुंहाने पर झांकना पड़ेगा। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जब कांग्रेस की अगुआई में जंग लड़ी जा रही थी, तब तमाम राजनीतिक और धार्मिक संगठन अंग्रेजों के तलवे चाट रहे थे। आजादी के बाद सबको साथ लेकर देश विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा था, तब संविधान सभा के सदस्य रहे जनसंघ के अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी मई 1953 में कश्मीर की यात्रा पर निकले। 17 फरवरी 1953 को उन्होंने पंडित नेहरु को चिट्ठी लिख 370 का समर्थन किया था। संविधान सभा में उन्होंने अनुच्छेद 370 का विरोध नहीं किया था मगर बाद में वह इसके विरोध में खड़े हुए।

उनकी इस अंतिम यात्रा का नतीजा यह हुआ कि शांति से आगे बढ़ रहे कश्मीर में अशांति के बीज बो दिये गये। हमें देखना होगा कि चीन ने तिब्बत पर कब्जा सिर्फ इसलिए किया था क्योंकि वह पानी कब्जाना चाहता था। यही वजह थी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने पर जोर दिया था। उन्होंने सरदार पटेल को लिखी चिट्ठी में स्पष्ट किया था कि हमें कश्मीर की नदियां हर हाल में चाहिए। ब्रिटेन और अमेरिका इनको पाकिस्तान में रखना चाहते थे। आज जल की महत्ता को समझा जा सकता है। अगर यह नदियां हमारे कब्जे में न होतीं, तो क्या होता?

इसी बूते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि हम पाकिस्तान का पानी रोक देंगे। पटेल ने नेहरु की स्ट्रेटेजी के तहत कश्मीर की नदियो पर कब्जा किया। अगर कश्मीर हमारे पास नही होता तो भारत एक “प्यासा देश” होता। हम चीन और पाकिस्तान से पानी की भीख मांग रहे होते। चीन का ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियों के पानी पर नियंत्रण के कारण ही हमारे अरुणाचल, असम और पूर्वी भारत मे पानी की समस्या इसका उदाहरण है। अगर तत्कालीन सरकार ने झूठे प्रपोगंडा को अपनाया होता तो हालात क्या होते समझ सकते हैं।

एक दिन एक मुख्यमंत्री से निजी चुनावी चर्चा हो रही थी। उन्होंने हमें अपना एक मंत्र बताया कि गोयबल्स ने कहा था कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वह सच लगने लगता है। इसका प्रयोग करके 1977 में सत्ता हासिल की। 1990 के दशक में इस मंत्र ने देश की तस्वीर बदल दी। कश्मीर स्थायी समस्या बन हमारा वोट बैंक बन गया। 2014 आपके सामने है और अब आगे भी यह काम आएगा। उन्होंने कहा इस सफलता में हमसे ज्यादा, यहां की जनता के चरित्र का योगदान है, जो झूठ और सच में अंतर नहीं कर पाती। हमें सबसे अधिक सीटें यूपी-बिहार में मिलीं जबकि यूपी-बिहार में गैर कांग्रेसी सत्ता अधिक वक्त तक रही। हमने सुशासन के नाम पर सत्ता हासिल की, जनता को हमारे नारे पर विश्वास है, तो हम आगे भी जीतेंगे।

उनका आत्मविश्वास देखकर हमें आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस के 18 फीसदी वोट घट गये थे। उसका गढ़ समझे जाने वाले यूपी, बिहार, तमिलनाडु, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, गुजरात और केरल में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी थीं। आज अगर हम इन राज्यों के हालात पर चर्चा करते हैं, तो देखते हैं कि गैरकांग्रेसवाद की बात करने वाले इन राज्यों में अधिकतर की हालत सबसे बदतर है। 1960 के दशक तक बिहार देश का सबसे अगुआ राज्य था, जो आज देश का बीमारू राज्य है। उड़ीसा और पश्चिम बंगाल की हालत बद से बदतर हुई है। यूपी न सिर्फ बदहाल है बल्कि वहां जंगलराज जैसे हालात हैं। केरल प्राकृतिक संपदा के बूते खड़ा है तो गुजरात समुद्री व्यापार और समृद्ध व्यापारिक शहरों की खा रहा है। तमिलनाडु का जीडीपी में कोई बड़ा योगदान नहीं है। बावजूद इसके, इन राज्यों के चुनावों में विकास और जनकल्याण मुद्दा नहीं बनता है।

हमारे देश की विडंबना यह है कि चुनाव घोषणा पत्र झूठ का पुलिंदा बनकर रह जाता है। कौन झूठ को कितना बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर, उन्हें भावनाओं से जोड़ लेता है। धार्मिक और जातिगत भावनायें इतनी हावी होती हैं कि शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, जनविकास और सार्वजनिक समृद्धि की बातों को पीछे छोड़ देती हैं। पहले सिर्फ चुनावी जुमले होते थे मगर अब तो सरकारी मंचों से भी झूठ बोला जाता है। कभी आंकड़े छिपाये जाते हैं, तो कभी झूठे प्रस्तुत किये जाते हैं। झूठी कहानियों से लेकर इतिहास तक गढ़ा जाने लगा है। जनता उन पर यकीन भी कर लेती है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल ने भारत की जनता के चरित्र को समझ लिया था। उन्होंने बांटो और राज करो की नीति अपनाई थी। यही नीति अब हमारे सियासतदां अपना रहे हैं। उनकी धर्म और जाति की घुट्टी के आगे विकास और विनाश का अंतर जनता को समझ नहीं आ रहा। चर्चिल ने अपनी संसद में कहा था कि भारत के लोग आजादी के योग्य नहीं हैं। जिससे जल्द ही सत्ता दुष्टों, बदमाशों और लुटेरों के हाथ में चली जाएगी। वहां के नेता ओछे और भ्रष्ट किस्म के होंगे, जो सत्ता के लिए झगड़ेंगे और देश बरबाद हो जाएगा। राजनीतिक लूट के कारण एक दिन हवा-पानी पर भी टैक्स लगा दिया जाएगा। हम देख रहे हैं कि आज सत्ता के लिए वह सब हो रहा है जो चर्चिल ने 72 साल पहले कहा था।

हमारे देश की संवैधानिक संस्थाएं हों या जांच एजेंसियां सभी का इस्तेमाल सत्ता के लिए किया जा रहा है। सीबीआई, ईडी, आईटी, एनआईए, एनसीबी, पुलिस रॉ, आईबी और आरबीआई का इस्तेमाल विरोधियों को खत्म करने के लिए हो रहा है। निचली अदालतों की बात छोड़िये सर्वोच्च अदालतों तक के फैसले सत्ता का चारण करते दिखते हैं। इन सभी पर सवाल उठाने का दायित्व निभाने की जिम्मेदारी जिस मीडिया के कंधे पर थी, वह सत्ता के बजाय विपक्ष से सवाल करती है। चंद दिन पहले पत्रकारिता के आदर्श पंडित गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती थी। पत्रकारों को दिया गया उनका मंत्र हमें याद आता है “पत्रकार को सत्ता का स्थाई विपक्ष होना चाहिए”। उन्होंने अपने इसी मंत्र का पालन करते शीश कटवा दिया था। आज उनके भारत में मीडिया झूठ का सौदागर बन गई है।

वह धृतराष्ट्र की तरह सबकुछ देखकर भी सत्ता का गुणगान करती है। इसके दो कारण हैं, पहला, ज्ञानवान और योग्य लोगों का अभाव और दूसरा, सत्तानुकूल विचारधारा के आगे समर्पण की नीति। सत्तारूढ़ दलों ने इसका फायदा उठाया और अब वह कभी लोगों को लड़वाते हैं तो कभी राज्यों में टकराव कराते हैं। राजनेताओं की ही नहीं संस्थाओं की भी विश्वसनीयता दांव पर है। जब संकट आता है, तो सरकार कहती है कि उसके पास आंकड़े ही नहीं हैं। नोटबंदी के दौरान लाइनों में खड़े सवा सौ लोग मर जाते हैं। जीएसटी आने पर कारोबार तबाह होने पर आत्महत्यायें होती हैं। किसान से अधिक युवा आत्महत्या करते हैं। बेरोजगारी हो या आर्थिक संकट, देश के भीतर अव्यवस्था हो या सीमाओं पर विदेशी कब्जा, सभी पर या तो सरकार झूठ बोलती है या आंकड़ा ही नहीं देती। मीडिया सरकार की प्रचारक बन जाती है और संवैधानिक संस्थायें घरेलू नौकर।

वक्त रहते हम सच और झूठ का अंतर न कर पाये, तो 72 साल पहले विंस्टन चर्चिल का बोला हर शब्द सच हो जाएगा। अगर देश बरबाद हुआ तो न आप बचेंगे और न आपका घर-परिवार। सोचिये और गलतियों को सुधारकर आगे बढ़िये।

जय हिंद!

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक मल्टीमीडिया हैं)

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