Ajay Shukla Exclusive Column: महात्मा गांधी के आह्वान पर देश भर में विदेशी कपड़ों की होली जलाई जा रही थी। ब्रिटिस युवक जैसा दिखता एक शख्स आया और उसने अपने कीमती सूट आग में डालकर उसे और भी भड़का दिया. यह युवक कोई और नहीं बल्कि लालकिले पर पहली बार आजादी का तिरंगा फहराने वाले अपने पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे. यह वर्ष 1921 के अगस्त महीने की बात है. राष्ट्र नायक की भूमिका में नजर आ रहे महात्मा गांधी के आग्रह पर पूरे देश में विदेशी कपड़ों की होली जलाई जा रही थी. गांधी ने चरखा कात कर, हमें यह संदेश दिया था कि हर किसान अपने कपास से खुद कपड़े बना सकता है. अंग्रेज व्यापारी भारत से कपास ले जाते और मैनचेस्टर में कपड़ा बनाकर, हमें ही बेहद महंगा बेचते थे. महात्मा गांधी ने जब यह देखा कि हमारी उपज का इस्तेमाल करके हमे ही लूटा जा रहा है, तो उन्होंने यह आंदोलन शुरू किया था. नतीजतन करोड़ों भारतियों ने विदेशी कपड़ों का त्याग कर खादी को अपनाया था. ऐश ओ आराम में पले पंडित नेहरू ने सुकोमल कपड़े छोड़कर, जब पहली बार खादी पहनी तो उनका बदन छिल गया था मगर उन्होंने गांधी के मार्गदर्शन में न सिर्फ विदेशी कपड़े जलाये बल्कि जेल भी गये. यह स्वावलंबन की पहली सीढ़ी थी, जो हमारी ताकत बनी. सबसे पहले 1872 में बंकिम चंद्र चटोपाध्याय ने स्वदेशी आंदोलन शुरू किया था. कवि महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इस पर कविता लिखकर लोगों को झकझोरा था। गांधी ने इसे राष्ट्रीय आंदोलन बनाया था. हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सौ साल बाद अब आत्मनिर्भर बनने पर जोर दे रहे हैं मगर हम मुनाफा खोज रहे हैं.

गुरुवार को प्रधानमंत्री ने कर व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए ‘पारदर्शी कराधान- ईमानदार का सम्मान’ मंच की शुरुआत की. जिस वक्त मोदी ईमानदार करदाताओं की तारीफ कर रहे थे, उसी वक्त सरकार ने करदाताओं के खर्च पर अधिक निगरानी के लिए एक चार्टर पेश किया. प्रधानमंत्री भले ही देश को आत्मनिर्भर बनाने और ईमानदार कराधान व्यवस्था लागू करने की सोच रहे हों मगर उनके बाबू आमजन पर नकेल डालने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते. वह आमजन को आत्मनिर्भर बनाने में मददगार भले ही न हों मगर खुद की कमाई के रास्ते निकालने में लगे रहते हैं. इसी अव्यवस्था का परिणाम है कि पिछले कुछ महीनों में देश के करीब 65 फीसदी लोगों की आमदनी में भारी कमी आई है. करीब 20 करोड़ लोगों के रोजगार छिन गये हैं. बाबूशाही अपनी नाकामी छिपाने के लिए सरकार से निजीकरण की नीतियां बनवा रही है. जिससे हम सभी की गाढ़ी कमाई से खड़ी की गईं, सार्वजनिक कंपनियां (पीएसयू) भ्रष्टाचार फैलाने वाले कारपोरेट के हाथों सौंपी जा सकें. वह हमारी संपत्तियों के मालिक बन जायें हम दीनहीन बनकर उनके आगे काम के लिए हाथ फैलाते धक्के खायें. देश की आजादी के 73 साल पूरे होने पर हमें नये तरह की अंग्रेजी कारपोरेटिक हुकूमत के आगे माथा रगड़ने की नौबत भी आएगी, यह तो गांधी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा. गांधी ने तमाम आंदोलन किये मगर जब आंदोलन भटके और जनता को नुकसान हुआ, तो उन्होंने उसे बीच में ही खत्म कर दिया. उनके लिए आंदोलन नहीं बल्कि जनहित सर्वोपरि था.

भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को पिछले वित्तीय वर्ष के डिवीडेंट के तौर पर 57,128 करोड़ रुपये का सरप्लस सरकार को देने का फैसला किया कुछ माह पहले ही सरकार ने आरबीआई से 1.76 लाख करोड़ रुपये निकाले थे. इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान सरकार का राजकोषीय घाटा 6.62 लाख करोड़ रुपये हो गया। देश के इतिहास में पहली बार किसी तिमाही में राजकोषीय घाटा इस स्तर पर पहुंचा है. कोरोना महामारी और पिछले कई फैसलों से बिगड़ी अर्थव्यवस्था का असर सरकार के राजस्व पर पड़ा है, जिससे राजकोषीय घाटा बहुत बढ़ गया है. आईटी कंपनी इन्फोसेस के संस्थापक एनआर नारायणमूर्ति ने कोविड-19 से पैदा हुए हालात और उन पर सरकारी नीतियों को देखते हुए ही कहा कि देश की आर्थिक दशा बदतर हो रही है. सही दिशा में सार्थक कदम नहीं उठाये गये, तो आजादी के बाद सबसे बुरे हालात होंगे. जो बात नारायणमूर्ति ने कही, कमोबेश वही विश्व बैंक, आईएमएफ, एडीबी, नोमूरा, इकरा और गोल्ड माइन जैसे आर्थिक संस्थायें भी कह चुकी हैं. पूर्व प्रधानमंत्री एवं अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सरकार को तीन सुझाव देते हुए, अर्थव्यवस्था सुधारने के उपाय बताये हैं. इनके जवाब में कुछ अच्छा करने के बजाय नौकरशाही जो उपाय बता रहा है, उससे हालात भविष्य में भी बदतर होना तय है. वह कारपोरेट घरानों के लिए नीतियां बनाने में जुटी है.

हमारे देश का आर्थिक ढांचा सामाजिक-पूंजीवाद का है. देश की आजादी के साथ हमने इसे अपनाया था, जिससे आज देश के गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के पास भी जीने के साधन उपलब्ध हो सके हैं. हमने आधारिक संरचना को महत्व दिया, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े-बड़े उपक्रम खड़े हो सके. इनके बूते हमने अपनी उत्पादकता और गुणवत्ता को नियंत्रित किया. पिछले साल के आंकड़े बताते हैं कि हमने इस पर सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 30 फीसदी ही खर्च किया, जो हमारे प्रतिद्वंदी देशों के मुकाबले काफी कम है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत को इस पर अधिक निवेश करना चाहिए क्योंकि हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकते हैं मगर हमारी बाबूशाही ने इसे बेचने पर आमादा है. वह शहरी, औद्योगिक संपत्तियों को ही नहीं बल्कि जल, जमीन, जंगल तक को बेचने में जुटी है. रेल से लेकर एयरलाइंस तक सभी कुछ कारपोरेट के हाथों सौंपना चाहते हैं. हमारे प्रतिनिधि बीएसएनएल और सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था को स्मार्ट बनाने के बजाय उसे भी कारपोरेट को सौंपने की तैयारी में हैं. देश में बैड लोन का भी कारण बाबूशाही और सियासी गठजोड़ रहा है. उसने बैंकिंग को सुधारकर ग्राहकों के लिए सुविधाजनक बनाने पर जोर नहीं दिया, बल्कि गलत लोन के लिए दबाव बनाया. जिससे अर्थव्यवस्था बेहाल हुई है.

आमजन पर कम से कम कर का बोझ पड़े, इसके लिए वह अधिक से अधिक विकल्प तैयार करती है. इसके उलट, बीते कुछ सालों से सरकार ने सभी काम-धंधे कारपोरेट को सौंपने और खुद सिर्फ नीति नियंता बने रहने की नीति अपनाई है. ऐसा करते वक्त, वह भूल जाती है कि जब पूंजी कारपोरेट के हाथ में होगी, तो वह सरकार पर न सिर्फ दबाव बनाने में सक्षम होगी बल्कि अपने मुताबिक नीतियां भी बनवाने को मजबूर करेगी. इससे जनता सिर्फ नौकर बनकर रह जाएगी. स्वावलंबन-स्वदेशी, आत्मनिर्भर सिर्फ नारा ही रह जाएगा. इस वक्त जरूरत नायक बनकर कारपोरेट को निरंकुश होने से रोकने और आमजन को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की है. हमारी योग्य युवा पीढ़ी सिर्फ नौकरी करने वाली नहीं बल्कि नौकरी देने वाली भी बननी चाहिए. उनको समान और प्रतिस्पर्धी अवसर उपलब्ध कराने के लिए संरक्षण की जरूरत है. भारत जैसे देश में सामाजिक-पूंजीवाद की राह को ही अपनाकर समृद्धि की ओर बढ़ा जा सकता है. यही राह लोगों को आत्मनिर्भर भी बना सकती है और वैश्विक मंच पर सक्षम भी. अन्यथा हमारे युवाओं का अराजकता की ओर बढ़ना तय है.

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