नई दिल्ली: आम चुनाव में मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर जब भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी बनकर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ीं तो हिन्दू/भगवा आतंकवाद विमर्श के केंद्र में आ गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिंदू आतंकवाद की थ्योरी को कांग्रेस की देन बताया था। इस मुद्दे पर टेलीविजन पत्रकार डॉ. प्रवीण तिवारी की किताब आतंक से समझौता ने भी हिंदू आतंक को एक खतरनाक साजिश के रूप में रेखांकित किया है। साध्वी प्रज्ञा और दिग्विजय सिंह की लड़ाई सांकेतिक थी, दोनों की लड़ाई दिग्विजय सिंह के सीएम के रूप में दूसरी पारी खत्म होने के बाद शुरू हुई। किताम में विस्तार से बताया गया है कि कैसे राजनैतिक लड़ाई नफरत की इंतहा पार कर गई और साध्वी प्रज्ञा को एक आतंकी साबित करने की साजिश रची गई। लंदन के पब्लिशर ब्लुम्सबरी ने इसे छापा है। यह पुस्तक अंग्रेजी में द ग्रेट इंडियन कॉन्सपीरेसी के नाम से छपी है।

किताब में बताया गया है कि उमा भारती ने जब दिग्विजय सिंह को हराया तब साध्वी प्रज्ञा युवा कार्यकर्ता थी लेकिन तब से ही उनके फायर ब्रांड भाषण और तीखे बयान लोगों के बीच मशहूर होने लगे थे। दिग्विजय सिंह इस बात से तब से ही नाराज थे। बाद में हिंदू आतंक की थ्योरी रचने में दिग्विजय सिंह ने अहम भूमिका निभाई, 26/11 के मुंबई आतंकी हमले को संघ की साजिश करार देने में जुटे रहे। ये भी महज इत्तेफाक नहीं की भगवा आतंक की इस थ्योरी के सभी किरदार मप्र या आसपास के इलाकों के थे।

इस किताब में ये भी खुलासा किया गया है कि कैसे पहले ही एटीएस ने ये साबित कर दिया था कि इन धमाकों के पीछे सिमी के आतंकियों का हाथ है। बकायदा इन आतंकियों के नार्को टेस्ट में ये बात सामने आ गई थी। पुस्तक में कर्नाटक फॉरेंसिक साईंस लेबोरेटरी के तत्कालीन प्रमुख बी. एम. मोहन का इंटरव्यू भी है जिन्होंने इस बात को पुख्ता किया है कि सिमी आतंकी पहले ही कथित हिंदू आतंकी हमलों की बात स्वीकार कर चुके थे। ज्वाइंट इंटेलीजेंस कमेटी के तत्कालीन चेयरमैन डॉ. एस. डी. प्रधान ने भी इस किताब में भगवा आतंक की जांच को एक खास दिशा दिए जाने की बात को रखा है। समझौता ब्लास्ट से जुड़े कुछ एक्सक्लुसिव दस्तावेजों को किताब में रखा गया है जो बताते हैं कि कैसे एक संदिग्ध पाकिस्तानी को भारतीय जांच एजेंसियों ने छोड़ दिया और पूरे मामले को हिंदू आतंक से जोड़ने की नापाक साजिश रची गई। इस किताब के मुताबिक मालेगांव, अजमेर शरीफ और समझौता ब्लास्ट को एक अलग रंग देकर तत्कालीन सरकार ने असली आतंक के खिलाफ लड़ाई से समझौता किया था। हालांकि किताब में कई जगह अतिश्योक्ति झलकती है।

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