मुंबई. यूनाइटेड नेशंस में इस बार स्वीडन की 16 वर्षीय ग्रेटा थनबर्ग की वायरल स्पीच तो आपने सुनी ही होगी. जब दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुखों से एक स्कूली छात्रा ने पूछा कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि एक तरफ पर्यावरण खत्म करते जाओ और दूसरी तरफ सिर्फ आर्थिक विकास का गाना गाते जाओ. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने संबोधन की शुरुआत पर्यावरण के मुद्दे से ही की. इसके बावजूद मुंबई का फेफड़ा कहे जाने वाले आरे फॉरेस्ट को काटने का काम शुरू हो गया है.

मुंबई में आंदोलनकारी लगातार डटे हुए हैं लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के बाद अब लगता नहीं कि ये जंगल बच पाएंगे. शिवसेना नेता आदित्य ठाकरे जो इस बार वर्ली से विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं, उन्होंने भी सरकार के फैसले को बेवकूफी भरा बताया है. राज्य में बीजेपी और शिवसेना की सरकार है लेकिन शिवसेना इस मुद्दे पर सरकार के खिलाफ नजर आ रही है.

प्रदर्शनकारी पेड़ों के पास डटे हुए हैं. पुलिस ने सैकड़ों की संख्या में लोगों को हिरासत में लिया है. इसी दौरान कुछ तस्वीरें सामने आईं हैं. इसमें एक लड़की पेड़ों से चिपकी हुई है ताकि उसे काटा न जा सके. इस तस्वीर ने भारत में पर्यावरण के ऊपर आंदोलनों की नींव रखने वाले चिपको आंदोलन की याद दिला दी है.

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चिपको आंदोलन: पर्यावरण के लिए किया गया सबसे ऐतिहासिक आंदोलन बना
 1974 में उत्तराखंड के टिहरी में सरकार ने जंगल की कटाई का हुक्म दे दिया. सरकारी ठेका प्राप्त कॉन्ट्रेक्टर पेड़ों की कटाई के लिए आ गए. पहाड़ों में बसे इस गांव में लोगों ने जंगल काटने का विरोध किया. विरोध का तरीका गांधीवादी था यानि पूरी तरह अहिंसक. दसोली ग्राम स्वराज संघ जैसे संघटन तो बने ही जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से थे.

सरकारी ठेका जंगलों के कई तरह के उपयोग के लिए दिया जाने लगा. कभी इलाहाबाद की कंपनी के लिए टेनिस रैकेट बनाने के लिए तो कभी किसी और नाम पर. ग्रामीणों ने संघटन बनाकर इसका विरोध करना शुरू किया. इस आंदोलन की खास बात यह थी कि इसमें महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले ज्यादा बड़े स्तर पर भागीदारी की. गौरा देवी, सुदेशा देव, बचनी देवी जैसी महिलाएं इस आंदोलन की हीरो थीं. वहीं महान गांधीवादी सुंदरलाल बहुगुणा, गोविंद सिंह, रावत, धूम सिंह नेगी, शमशेर सिंह बिष्ट और घनश्याम रतौड़ी ने चिपको आंदोलन में अहम भूमिका निभाई.

क्यों पड़ा चिपको नाम
चिपको आंदोलन इस नाम से नहीं शुरू हुआ था. यह तब हुआ जब जंगल की कटाई का हुक्म लिए सरकारी अधिकारी आए. उन्होंने पेड़ों की कटाई के विरोध में खड़े ग्रामीणों को वहां से हटाना शुरू कर दिया. बातचीत जल्द ही ग्रामीणों पर हमले में बदल गई. महिलाओं के साथ भी बदसलूकी होने लगी. इसी बीच महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं. दोनों हाथों से पेड़ों को गले लगाकर चिपक कर खड़ी हो गईं. पुलिस और फॉरेस्ट विभाग के अधिकारियों की लाख कोशिशों के बावजूद ये महिलाएं चार दिनों तक पेड़ों के साथ चिपकी हुई खड़ी रहीं.

इस आंदोलन की पूरे देश में चर्चा हुई. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा ने इसकी रिपोर्ट अपने पास मंगाई और जल्द ही पेड़ों की कटाई का आदेश रद्द कर दिया गया. इस तरह चिपको आंदोलन पूरी दुनिया में पर्यावरण के आंदोलनों का ध्वजवाहक बना. चिपको आंदोलन से जुड़े चंडी प्रसाद भट्ट को 1982 में रैमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला तो वहीं सुंदरलाल बहुगुणा को 2009 में पद्म विभूषण से नवाजा गया. सुंदर लाल बहुगुणा ने 1981-83 के बीच पांच हजार किलोमीटर की हिमालय यात्रा की ताकि जंगल संरक्षण का संदेश दूर तक फैले.

झारखंड में पेड़ों को बांधते हैं राखी, देते हैं रक्षा का वचन
झारखंड के हजारीबाग में लोगों ने पेड़ बचाने का अनोखा तरीका निकाला है. यहां भी बड़े स्तर पर पेड़ों की कटाई के सरकारी आदेश की तामील करने आए अधिकारों और ग्रामीणों में भिड़ंत हुई. हजारीबाग के टाटी झरिया गांव में लोगों ने पेड़ों को राखी बांधना शुरू किया. इसके बाद सरकारी अधिकारियों से पेड़ों की कटाई पर उनकी लड़ाई भी हुई. पेड़ बचाने का यह तरीका भी बेहद कारगर साबित हुआ और झारखंड सरकार को अपना आदेश वापस लेना पड़ा. इस इलाके में हर साल रक्षाबंधन पर लोग पेड़ों को राखी बांधते हैं और रक्षा का वचन देते हैं.

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