नई दिल्ली. मशहूर लेखिका और बुकर पुरस्कार से सम्मानित अरुंधति रॉय ने भी अपना बेस्ट स्क्रीन प्ले के लिए साल 1989 में मिले राष्ट्रीय पुरस्कार को लौटा दिया है. हालांकि अरुंधति ने सपष्ट किया है कि उन्होंने पुरस्कार असहिष्णुता बढ़ने या सरकार के विरोध के लिए नहीं लौटाया है बल्कि देश के भीतर शुरू हुए नए किस्म के आतंकवाद के विरोध में लौटाया है जिसके चलते दलित, आदिवासी, मुस्लिम और इसाई दहशत में जीने के लिए मजबूर हैं.
 
अरुंधति ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक लेख में कहा कि जो लोग दादरी में घर में घुसकर एक व्यक्ति की हत्या कर देने को ‘असहिष्णु होना’ करार दे रहें हैं मैं उन लोगों से भी सहमत नहीं हूं. उन्होंने कहा कि जो लोग इसे एक अचम्भे की तरह देख रहे हैं, मैं उन्हें बता दूं कि मुझे इन घटनाओं को लेकर कोई अचम्भा नहीं हो रहा है. अरुंधति ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस सरकार को एक बहुसंख्यक जनता ने सत्ता में चुनकर भेजा है उसके आने पर ऐसी घटनाओं का घटना अचंभित करने वाला नहीं हो सकता.
 
अरुंधति ने कहा कि इस सरकार के आने के बाद से देश में ऐसा माहौल बन गया है जिसमें एक इंसान की जिंदगी की कीमत फ्रिज में रखे मीट के मच टुकड़ों से भी कम आंकी जा रही है. ऐसे मामलों को गोमांस प्रतिबन्ध से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. अरुंधति ने आगे कहा कि मैं जानती हूं कि मेरे पुरस्कार लौटाने को भी कुछ लोग बीजेपी VS कांग्रेस की डिबेट में उलझाने की कोशिश करेंगे लेकिन मैं बता दूं कि साल 2005 में मैंने कांग्रेस सरकार के विरोध में साहित्य एकेडमी पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था. अरुंधति ने कहा कि साहित्यकार, फ़िल्मकार, इतिहासकार और वैज्ञानिक जो अपने पुरस्कार लौटकर एक मुहिम चला रहे हैं मैं पूरी तरह से उसके सपोर्ट में हूं. इसी कड़ी को आगे बढ़ाने के लिए मैंने अपना पुरस्कार लौटाया है. 

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