नई दिल्ली. बिहार सरकार के शराबबंदी कानून को पटना हाईकोर्ट ने 30 सितम्बर को गैरकानूनी घोषित किया था. बिहार सरकार ने आज सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी है. कोर्ट जल्द ही सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. मामले में कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा.
 
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एडवोकेट केशव मोहन ने बिहार सरकार की याचिका में कहा है कि- हाईकोर्ट के शराबबंदी कानून को रद्द करने से बिहार सरकार की सदभावी पॉलिसी को बडा धक्का लगा है. हाईकोर्ट ने पॉलिसी को रद्द करते हुए ये नहीं देखा कि संविधान का आर्टिकल 47 राज्यों को नीति निर्देशक तत्व के तहत ऐसी पॉलिसी बनाने का अधिकार देता है. खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने कई आदेशों में कहा है कि राज्य सरकार शराबबंदी को लेकर नोटिफिकेशन जारी कर सकती है.
 
केशव ने हाईकोर्ट में जजों के बीच ही एकमत नहीं होने की बात भी उठाई. केशव ने कहा- हाईकोर्ट मे एक जज मानते हैं कि शराब पीना मौलिक अधिकार के तहत है जबकि बेंच में शामिल चीफ जस्टिस के विचार इससे अलग हैं. बिहार में शराबबंदी कानून जनहित में है और इसे समाज के बड़े तबके और खास तौर पर महिलाओं ने सराहा है. क्योंकि शराब की वजह से उनके घर की आमदनी बर्बाद होती थी, कर्जा हो गया और घरवालों के स्वास्थ्य तबाह हो गए.
 
बार और रेस्तरां वालों को लाइसेंस फीस वापस करेगी सरकार
यही नहीं उन्होंने आर्थिक पक्ष को उठाते हुए कहा कि- बिहार सरकार ने शराब बनाने वाले और बाटलिंग करने वालों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया ताकि उनको किसी तरह का नुकसान ना हो. राज्य में बार और रेस्तरां वालों को सरकार ने कहा है कि वो उनकी शराब के स्टाक को उसी रेट में खरीद लेंगे जिसमें उन्हें दिया गया था. साथ ही सरकार उन्हें लाइसेंस फीस भी वापस करेगी.
 
हाईकोर्ट ने शराबबंदी कानून को रद्द किया था
इसके पहले बीते 30 सितम्बर को पटना हाईकोर्ट ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को करारा झटका देते हुए शराबबंदी एक्ट को गैरकानूनी घोषित कर दिया था. बिहार में शराबबंदी कानून को इसी साल अप्रैल में लागू किया था.
 
पटना हाई कोर्ट में नए उत्पाद अधिनियम पर सुनवाई के दौरान तमाम दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने इस कानून को गलत करार देकर रद्द करने का आदेश दिया था. इसके बाद राज्य में देशी शराब पर तो प्रतिबंध था पर विदेशी शराब प्रतिबंध के बाहर थी.