नई दिल्ली. ग्रीनपीस इंडिया ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा है कि पावर सेक्टर को प्रदूषण फैलाने वाले और वैश्विक जलवायु परिवर्तन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले कोयला उद्योग के अलावा अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) पर भी ध्यान देने की जरूरत है. ग्रीनपीस इंडिया का कहना है कि ऊर्जा मंत्रालय को समझना चाहिए कि अक्षय ऊर्जा ही भविष्य के लिये सबसे टिकाऊ और स्वच्छ माध्यम है, जिसमें देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की क्षमता है. 
 
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दिल्ली के ली मेरिडियन होटल में आज ‘इंडियन कोल – सस्टेनिंग द मोमेंटम’ नाम की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी, जिसमें कोयला और ऊर्जा मंत्रालय ने हिस्सा लिया थी. वहीं ग्रीनपीस इंडिया ने भी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जहां उसने कोयला उद्योग को जारी रखने पर सवाल उठाए.
 
बता दें कि अक्षय उर्जा में वे सारी ऊर्जा शामिल हैं जो प्रदूषण नहीं फैलाती है और जिनके स्रोत का क्षय नहीं होता और इन स्रोतों का पुनः भरण होता रहता है. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जलविद्युत उर्जा, ज्वार-भाटा से प्राप्त उर्जा, बायोमास, जैव इंधन अक्षय ऊर्जा में आते हैं.
 
ग्रीनपीस इंडिया के कैंपेनर सुनिल दहिया ने कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘इस समय हमें एक असफल इंडस्ट्री को बचाने की कोशिश करने के बजाय, भविष्य के लिये नई संभावनाओं को तलाशने में ध्यान देना चाहिए. यदि ऊर्जा सेक्टर विकास के साथ अपनी गति बनाए रखना चाहे, तो इसे खुद को बदलना होगा’. 
 
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लिये महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा लक्ष्यों को रखा है जिन्हें पाने के लिये ऊर्जा क्षेत्र में निवेश व ध्यान दोनों केंद्रित करना होगा. भविष्य के हिसाब से यही सुरक्षित उपाय है, न कि हर कीमत पर कोयले को जारी रखने की सोच, जो  देश के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिये एक खतरा बन चुका है.
 
बता दें कि दिसंबर 2015 में ग्रीनपीस इंडिया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पेरिस जलवायु परिवर्तन कॉन्फ्रेंस में की गई घोषणा का स्वागत किया था, जिसमें उन्होंने 2022 तक 175 गिगावाट ऊर्जा अक्षय स्रोतों से हासिल करने का लक्ष्य रखा था. वहीं सरकार कोयला में भी निवेश को प्रोत्साहित कर रही है और थर्मल पावर प्लांट को लगाने की योजना बना रही है.
 
ग्रीनपीस इंडिया ने ऊर्जा मंत्रालय से यह मांग की है कि वह पेरिस समझौते में शामिल अक्षय ऊर्जा के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में ठोस कदम उठाए. संस्था ने पर्यावरण मंत्रालय से भी कहा है कि वह कोयला खनन और थर्मल पावर प्लांट्स को दिए जा रहे क्लियरेंस पर रोक लगाए.
 
दहिया ने कहा, ‘स्वयं केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, हमारे पास कोयला और बिजली का पहले से ही सरप्लस है. ऐसे मे सरकार को कोयला आधारित बिजली परियजोनाओं की बजाय अपने प्रयास भारत के अक्षय ऊर्जा की संभावनाओं को बढ़ाने में लगाना चाहिए. यही एक मात्र रास्ता है जिससे हम लोगों के स्वास्थ्य को, खत्म होते जंगल को, वन्यजीव और जीविका के साधनों को बचाते हुए, देश की ऊर्जा जरुरतों को पूरा कर सकते है, और वैश्विक जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिश में अपनी भूमिका निभा सकते हैं’
 
ग्रीनपीस इंडिया ने कोयला आधारित अर्थव्यवस्था से हटने की जरुरतों पर ध्यान आकर्षित करवाते हुए कोल सेक्टर से जुड़ी गंभीर चिंताओं की तरफ भी इशारा किया. ग्रीनपीस इंडिया का कहना है कि सरकार को घने वन क्षेत्र वाले इलाके को कोयला खनन से बचाने के लिये एक पारदर्शी अक्षत नीति लाने की जरुरत है. उसने कहा कि आरटीआई से मिली सूचना के आधार पर ग्रीनपीस को पता चला है कि 825 में से 417 कोयला ब्लॉक नदी क्षेत्र में आते हैं. इन जगहों पर खनन से निश्चित ही देश के साफ जल स्रोतों पर असर पड़ेगा.
 
ग्रीनपीस इंडिया की रिपोर्ट ‘ट्रेशिंग टाइगरलैंड’ में यह तथ्य भी सामने आया था कि कोयला खनन की वजह से हजारों हेक्टेयर जंगल, बाघ, हाथियों व अन्य जीवों के निवास पर खतरा मंडरा रहा है. वहीं एक और रिपोर्ट ‘आउट ऑफ साईट’ में दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में वायु प्रदुषण की एक बड़ी वजह थर्मल पावर प्लांट का होना पता चला था. कोयला पावर प्लांट से निकलने वाले वायु प्रदुषण से 2012 में भारत में 80 हजार से 1.15 लाख लोगों के समयपूर्व मृत्यु होने का आकलन किया गया है।
 
इसी साल जून में निवेशकों के लिये ग्रीनपीस द्वारा जारी एक ‘फाइनेंस ब्रिफिंग’ में यह बताया गया था कि पानी की कमी की वजह से कोल कंपनियों को 2,400 करोड़ का घाटा हुआ और कोयला में निवेश एक खराब सौदा साबित हो रहा है.