नई दिल्ली. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि तीन तलाक की वैधता सुप्रीम कोर्ट तय नहीं कर सकता. इस मामले में कोर्ट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक हलफनामा दायर किया है. बोर्ड ने कहा है कि पर्सनल लॉ को सामाजिक सुधार के नाम पर दोबारा नहीं लिखेंगे. 
 
इनख़बर से जुड़ें | एंड्रॉएड ऐप्प | फेसबुक | ट्विटर
 
बोर्ड ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कोई कानून नहीं है जिसे चुनौती दी जा सके, बल्कि ये कुरान से लिया गया है. ये इस्लाम धर्म से संबंधित सांस्कृतिक मुद्दा है. बोर्ड ने हलफनामा में कहा, तलाक, शादी और देख-रेख अलग-अलग धर्म में अलग-अलग हैं. एक धर्म के अधिकार को लेकर कोर्ट फैसला नहीं दे सकता. 
 
कुरान के मुताबिक तलाक अवांछनीय है लेकिन जरुरत पड़ने पर दिया जा सकता है. इस्लाम में ये पॉलिसी है कि अगर दंपती के बीच में संबंध खराब हो चुके हैं तो शादी को खत्म कर दिया जाए. तीन तलाक को इजाजत है क्योंकि पति सही से निर्णय ले सकता है. वो जल्दबाजी में फैसले नहीं लेते. तीन तलाक का इस्तेमाल तभी किया जाता है जब वैलिड ग्राउंड हो.
 
सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है. तीन तलाक पर कुछ मुस्लिम औरतों ने सवाल खड़े किए थे और इसे कोर्ट तक लेकर गयी. इशरत जहां को उनके पति ने फोन पर तलाक दे दिया था जिसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया है. इशरत जहां का कहना है कि इस तरह के तलाक मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.