नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने जलीकट्टू मामले में आज सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने कहा कि क्या परंपरा के नाम पर बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को इजाजत दे देनी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि 18वीं शताब्दी में 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के बाल विवाह होते थे, जो अब नहीं होते, तो क्या उसे भी इजाजत दी जाए. 
 
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कोर्ट ने कहा, जलीकट्टू को क्या इजाजत दे देनी चाहिए भले ही वो 5000 साल पुरानी परंपरा हो और कानून के दायरे से बाहर हो. अगर तमिलनाडू सरकार हमें संतुष्ट करें कि हमारा रोक लगाने का फैसला सही नहीं तो मामले को संवैधानिक बेंच को भेज देंगे. मामले की अगली सुनवाई 23 अगस्त को होगी. 
 
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वहीं केंद्र सरकार ने कोर्ट में दायर हलफनामें में मांग की थी कि जलीकट्टू से रोक हटाई जानी चाहिए. ये कोई खूनी खेल नहीं है, ना ही सांडों को कोई नुकसान होता है. ये पुरानी परंपरा है जिसमें 30 सेकेंड से लिए सांड को काबू कर शक्ति प्रदर्शन किया जाता है. ये परंपरा महाभारत काल में भी थी जब श्रीकृष्ण ने कंस के महल में सांड को काबू किया और कौशल की राजकुमारी से शादी करने के लिए सात सांडों को काबू करने की कथा भी है. केंद्र ने तमाम कदम उठाए हैं कि खेल के दौरान सांड को कोई नुकसान ना हो. 
 
 

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