नई दिल्ली. जंगली जानवरों को उनके घर में नहीं मारा जा सकता सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी नील गायों, बन्दर और जंगली सुअरों को मारने पर रोक की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की. हालांकि कोर्ट ने बिहार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में नील गायों, बन्दर और जंगली सुअरों को मारने पर फिलहाल रोक लगाने से इंकार कर दिया है. 
 
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सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के तरफ से दलील दी गई कि इन राज्यों में बिना किसी सर्वे के ही इन जंगली जानवरों को मारा जा रहा है. बिहार ने खुद कहा है कि उनके यहां जानवरों से हो रहे नुकसान को लेकर न ही कोई सर्वे किया गया और न ही कोई स्टडी की गई. यही हाल दूसरे राज्यों का भी है. इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने इन जंगली जानवरों को मारने के लिए मुम्बई से शार्प शूटर बुला रखे है. 
 
जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंगली जानवर अगर वन क्षेत्र से बाहर निकलकर रिहायशी इलाकों में प्रवेश करते है और लोगों नुकसान होता है तो उनको मारा तो जा सकता है. लेकिन किसी भी जंगली जानवर को उनसे घर यानी वन क्षेत्र में नहीं मारा जा सकता है. वही एनिमल वेलफेयर बोर्ड ने भी जंगली जानवरों के मारने का विरोध करते हुए कहा कि केंद्र ने नोटिफिकेशन जारी करने से पहले नियमों का पालन नहीं किया है. ऐसे में इस पर रोक लगाई जाए.
 
सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सिरे से ख़ारिज करते हुए नील गायों, बन्दर और जंगली सुअरों को मारने पर रोक लगाने से इंकार कर दिया. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार को ज्ञापन देने के लिए कहा और ज्ञापन मिलने के बाद केंद्र को दो हफ्ते के भीतर इस पर फैसला लेना होगा. मामले की अगली सुनवाई 15 जुलाई को होगी. 
 
दरअसल एनिमल एक्टिविस्ट गौरी मुलेखी और NGO फेडरेशन आफ इंडियनएनिमल प्रोटेक्शन, वाइल्ड लाइफ रेस्क्यू एंड रेहबलिटेशन ने दायर याचिका में कहा गया है कि बिहार, हिमाचल, और उत्तराखंड में नीलगाय आदि को हिंसक जानवर घोषित कर लोगों को नुकसान पहुंचाने के नाम पर मारा जा रहा है. इस पर रोक लगानी चाहिए. 
 
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याचिका में केंद्र के 2015 के नोटिफिकेशन को गैरकानूनी बताया गया है और रोक लगाने की मांग की है जिसके तहत इन जानवरों को मारा जा रहा है. याचिका में कहा गया है कि सरकार ने बिना किसी आधार और वैज्ञानिक अध्ययन के ये नोटिफिकेशन जारी किया गया है.

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