नई दिल्ली. आज 3 जनवरी को भारत की पहली महिला शिक्षक, महान समाजसुधारक सावित्री बाई फुले की आज 189वीं जयंती है. ज्योतिबा फुले ने अपनी पत्नी सावित्री बाई फुले को पढ़ाकर उन्हें शिक्षा के महत्व से अवगत कराया. महाराष्ट्र के पुणे में उस दौर में जातिवाद हावी था और दलितों के साथ अन्याय अपने चरम पर था. महिलाओं को घर से बाहर निकलने की इजाजत नहीं होती थी. ऐसे दौर में ज्योतिबा फुले की प्रेरणा से सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख ने लड़कियों का स्कूल खोला साल 1848 में.

उन्हें समाज का काफी विरोध भी झेलना पड़ा लेकिन सावित्री बाई ने सब सहा लेकिन दीनता और मानसिक गुलामी से लड़ी और विजेता बनकर उभरीं. सावित्री बाई फुले के बारे में कुछ बातें और उनकी लिखी पांच कविताएं आप पढ़ेंगे तो समझेंगे कि क्यों हर भारतीय महिला को सावित्री बाई फुले का एहसानमंद होना चाहिए.

सावित्री बाई फुले ने पति ज्योतिबा फुले की प्रेरणा से 1848 में पहला स्कूल महाराष्ट्र के पुणे में खोला. इस दौरान उनके साथ एक और शिक्षिका फातिमा शेख भी पढ़ाने जाती थीं. सावित्री बाई फुले को ब्राह्मणोें और परंपरावादियों का विरोध किस कदर झेलना पड़ता था इसकी एक बानगी देखिए. सावित्री बाई जब भी स्कूल पढ़ाने जाती थीं हमेशा अपने साथ दो साड़ियां रखती थीं.

ऐसा इसलिए क्योंकि जब वो स्कूल जाती तो रास्ते में गांव के लोग उन पर कीचड़ फेंकते क्योंकि उस जमाने में लड़कियों का पढ़ने के लिए घर से बाहर निकलना बुरा माना जाता था. आज जब भारत की महिलाएं अपनी मेधा से दुनिया भर में छाई हुई हैं, उन्हें आज के दिन सावित्री बाई फुले को दिल से धन्यवाद और नमन जरूर करना चाहिए. 

सावित्री बाई फुले की पांच कविताएं

1. शूद्र शब्द का
सही अर्थ है- मूलनिवासी
आक्रामक शासकों ने
शूद्र का ठप्पा लगाया!

पराजित शूद्र हुए गुलाम
इरानी ब्राह्म्णों के
और ब्राह्म्ण अंग्रेजों के
बने उग्र शूद्र!

असल में शूद्र ही
स्वामी इंडिया के
नाम उनका था इंडियन।

थे शूर पराक्रमी हमारे पुरखे
उन्हीं प्रतापी योद्धाओें के
हम सब वंशज हैं।

2.

उसका नाम है अज्ञान
उसे धर दबोचो मजबूत पकड़कर पीटो
और उसे जीवन से भगा दो

3.

ज्योतिष पंचाग हस्तरेखा में पड़े मूर्ख
स्वर्ग नरक की कल्पना में रूचि
पशु जीवन में भी
ऐसे भ्रम के लिए कोई स्थान नहीं
पत्नी बेचारी काम करती रहे
मुफ्तखोर बेशर्म खाता रहे
पशुओं में भी ऐसा अजूबा नहीं
उसे कैसे इन्सान कहें?

4.
अंग्रेजी मैय्या, अंग्रेजी वाणई
शूद्रों को उत्कर्ष करने वाली
पूरे स्नेह से

अंग्रेजी मैया, अब नहीं मुगलाई
और नहीं बची है अब
पेशवाई, मूर्खशाही

अंग्रेजी मैया, देती सच्चा ज्ञान
शूद्रों को देती हैं जीवन
वह तो प्रेम से

अंग्रेजी मैया, शूद्रों को पिलाती हैं दूध
पालती पोसती हैं
मां की ममता से

अंग्रेजी मैया, तूने तोड़ डाली
जंजीर

5.
मेरे जीवन में ज्योतिबा स्वांनद समग्रआनंद
जिस तरह होता है शहद
फूलों, कलियों में।

ज्योतिबा को सलाम
ह्रदय से करतेहैं
ज्ञान का अमृत हमें वे देते हैं,
और जैसे हम
पुनर्जीवित होत जाते हैं

महान ज्योतिबा,
दीन दलित, शूद्र- अतिक्षुद्र
तुम्हें पुकारते हैं.

10 मार्च 1897 को सावित्री बाई फुले का 66 साल की उम्र में निधन हो गया. लेकिन इस दौरान वह महिला शिक्षा और दलितों के उत्थान के लिए इतना काम कर चुकी थीं कि भारतीय इतिहास उन्हें आदर के साथ झुक कर याद करता है. सावित्री बाई फुले न होतीं तो शायद भारत में महिलाओं के लिए शिक्षा की राह कई दशकों तक नहीं खुलती.

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