नई दिल्ली. आज से देश में मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के खौफ से आजादी मिल गई है. अब फोन पर तलाक-तलाक-तलाक अवैध हो गया है. सोशल मीडिया, स्पीड पोस्ट-कुरियर के जरिए एक साथ तीन तलाक लिखकर भेज देना नाजायज़ हो चुका है. मुंह ज़बानी एक साथ तीन बार तलाक बोल देना भी असंवैधानिक करार दिया जा चुका है. सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुना दिया है कि तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत आज से खत्म हो गया है.
 
क्या तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को बराबरी के अधिकार से वंचित करता है? क्या तीन तलाक असंवैधानिक और इस्लाम के खिलाफ है? ये सवाल तीन तलाक से पीड़ित पांच महिलाओं और दो संगठनों की याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सामने था, जिस पर चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 11 मई से 18 मई तक लगातार सुनवाई की. आज संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाया और तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया. 
 
संविधान पीठ में शामिल चीफ जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की राय थी कि तीन तलाक को पाप बताया गया है, लेकिन इस्लाम में तीन तलाक का चलन 1400 साल से है, लिहाजा इसे असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता. जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर की बात से संविधान पीठ के बाकी तीन जज- जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन और जस्टिस कुरियन जोसफ सहमत नहीं थे. इन तीनों जजों ने तीन तलाक को असंवैधानिक बताया. संविधान पीठ ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो सभी राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर 6 महीने में कानून बनाए.
 
तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले के बाद बराबरी की जंग लड़ रहीं मुस्लिम महिलाओं ने एक-दूसरे का मुंह मीठा कराया. हालांकि, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ मौलाना अब भी कह रहे हैं कि तीन तलाक एक धार्मिक और सामाजिक मसला है, जिसमें अदालत या सरकार को दखल नहीं देना चाहिए था. खासकर तब, जब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खुद ही समाज की सोच में बदलाव लाने की पहल कर रहा था.
 
अब तीन तलाक का खात्मा होने के बाद मुस्लिम समाज में तलाक से जुड़े मसले कैसे निपटाए जाएंगे, इस बारे में अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार इस बारे में छह महीने में कानून बनाए. 
 
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