Narwar Stepwells: जल संरक्षण की सदियों पुरानी मिसाल माने जाने वाले शिवपुरी के नरवर कस्बे की ऐतिहासिक बावड़ियां आज उपेक्षा का शिकार हैं. प्रशासनिक अभिलेखों में दर्ज 13 बावड़ियों में से केवल 6 ही वर्तमान में अस्तित्व में हैं, और उनकी हालत भी बेहद जर्जर है. शेष 7 बावड़ियों का या तो कोई स्पष्ट भौतिक अस्तित्व नहीं बचा है या वे पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं.
ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान सामने आया कि मौजूद छह बावड़ियों में से अधिकांश कचरे, मलबे, जंगली झाड़ियों और संरचनात्मक क्षति से घिरी हुई हैं. कहीं दीवारों में गहरी दरारें हैं, तो कहीं जल स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं. कई स्थानों पर अतिक्रमण के संकेत भी मिले हैं.
सत्रहवीं शताब्दी में हुआ था बावड़ियों का निर्माण
नरवर, अपने ऐतिहासिक किले और प्राचीन स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध है. स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार, इन बावड़ियों का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में तत्कालीन शासक राजा गज सिंह ने कराया था. इनका उद्देश्य वर्षा जल संचयन और लंबे समय तक जल उपलब्धता सुनिश्चित करना था.स्थानीय इतिहासकार देवेंद्र शर्मा के अनुसार, इन बावड़ियों की संरचना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से की गई थी. प्राकृतिक ढाल के माध्यम से वर्षा जल इन सीढ़ीनुमा संरचनाओं में एकत्र होता था, जिससे गर्मियों में भी पानी उपलब्ध रहता था.
भूजल का गिरता स्तर
आज विडंबना यह है कि जब नरवर क्षेत्र जल संकट, अस्थिर जल आपूर्ति और गिरते भूजल स्तर जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब ये पारंपरिक जल स्रोत उपेक्षा के कारण निष्क्रिय पड़े हैं. गर्मियों में कई इलाकों में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ जाती है.Jiwaji University से जुड़े इतिहासकार प्रतीक शर्मा का कहना है कि पारंपरिक जल संरचनाएं केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. उनका वैज्ञानिक पुनर्जीवन भूजल पुनर्भरण में अहम भूमिका निभा सकता है.
विशेषज्ञों ने जातायी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन बावड़ियों का संरक्षण, सफाई, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा घेराबंदी और पर्यटन सर्किट से जुड़ाव सुनिश्चित किया जाए, तो यह न केवल जल संरक्षण में मददगार साबित होंगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकती हैं.नरवर की बावड़ियां आज भी इतिहास की गवाही दे रही हैं, लेकिन उनका भविष्य संरक्षण की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों पर निर्भर करेगा. समय रहते पहल नहीं हुई, तो यह केवल एक ऐतिहासिक धरोहर का नहीं, बल्कि जल सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण स्रोत का भी नुकसान होगा.