नई दिल्ली. देशभर में होली का त्योहार 9-10 मार्च को मनाया जाएगा. होली की बात जब होती है तो बरसाने की होली को कोई कैसे भूल जाए. बरसाना की लठमार होली सबका मन मोह लेती है. लठमार होली श्रीकृष्ण नगरी में खेलने की सबसे पुरानी परंपरा है और खास बात है कि यह आज भी जीवंत है.

विदेशी सैलानी भी लठमार होली को काफी पसंद करते हैं इसलिए वे श्रीकृष्ण की भूमि यूपी के मथुरा आकर जमकर होली का त्योहार मनाते हैं. होली से पहले ही मथुरा एंव वृंदावन में तैयारियां अभी से जोरों शोरों पर है. मंदिरों पर होली का रंग छड सा गया है. मथुरा की होली एक महोत्सव की तरह मनायी जाती हैं. 3 मार्च से 10 मार्च तक चलने वाले त्योहार में अलग-अलग तरीके से होली महोत्सव मनाया जाता है.

बरसाना में सिर्फ होली खेलने का अर्थ त्योहार मनाना ही नहीं बल्कि उसके जरिए अपनी संस्कृति से जुड़े रहना और उसको बढ़ावा देना भी है जिससे देश के लोग सैंकड़ों साल पुरानी भारतीय परंपरा से रुबरु हो सकें. आइए जानते हैं ब्रज मंडल में कौनसी होली कब खेली जाएगी.

  1. 3 मार्च को अष्टमी के साथ लड्डू होली की शुरुआत होगी. लड्डू होली में एक-दूसरे पर लड्डू फेंके जाते हैं.
  2.  4 मार्च को बरसाना में लठमार होली खेली जाएगी. लठमार होली में सजनी अपने सजना को लठ से मारती हैं और साजन ढाल का उपयोग कर बचता नजर आता है.
  3. 5 मार्च को दशमी के दिन नंदगांव में पुरानी परंपरा अनुसार लठमार होली खेली जाएगी.
  4. 6 मार्च को मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि एवं वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा.
  5. 7 मार्च को गोकुल नगरी में छड़ी मार होली मनाई जाएगी.
  6. 9 मार्च को गांव फालैन में जलती हुई होली से पंडा को निकाला जाता है जो कि पुरानी परंपरा को प्रकट करता है. वही दूसरी ओर द्धारिकाधीश मंदिर से होली का डोला नगर भ्रमण करते हैं.
  7. 10 मार्च को द्धारिकाधीश मंदिर में लोग भगवान के भजन गाते हुए टेसू के फूल से होली खेलते हैं. जिससे मंदिर प्रांगण में खुशनुमा माहौल हो जाती है और लोग एक-दूसरे को अबीर गुलाल लगाते हैं

मथुरा एवं वृंदावन में इस परंपरा की शुरुआत भगवान श्रीकृष्ण की नटखठ लीलाओं से हुई थी. श्रीकृष्ण शुरु से ही अपनी लीलाओं के लिए जाने जाते थे. होली में उनकी लीलाएं ओर भी बढ़ जाती थी जब वे अपने सखाओं व राधे के साथ होली खेलते नजर आते थे. राधा उनकी सखियों के साथ श्रीकृष्ण व सखाओं से बचने के लिए लठ बरसाती थी और सखा ढाल का उपयोग कर बचते नजर आते थे.

इस तरह पता चलता है कि लठमार व छड़ी होली की परंपरा बहुत पुरानी हैं. लेकिन वर्तमान में लोग रंगो का उपयोग कर होली खेलते है और गानों पर नाचते नजर आते हैं. बदलते समय के साथ होली खेलने का तरीका भी बदल गया है लेकिन श्रीकृष्ण नगरी में आज भी अबीर, टेसू के फूलों से होली मनायी जाती हैं ताकि पुरानी परंपरा को जीवंत रखा जा सकें.

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