नई दिल्ली: इन दिनों जो हवा आप अपनी नाक के जरिए अपने फेफडों में भर रहे हैं उससे आपकी जिंदगी के कम से कम सात साल कम हो रहे हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एयर क्वॉलिटी लाइफ इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक 1998 से 2016 के बीच भारत की आबादी 40 फीसदी बढ़ी है जबकि प्रदूषण 72 फीसदी बढ़ा है. रिसर्च के मुताबिक प्रदूषण की वजह से 1998 में औसतन 3.7 साल की उम्र कम होती थी जो अब बढ़कर 7 साल हो गई है.

सर गंगाराम अस्पताल के चेस्ट सर्जन डॉ अरविंद कुमार ने हवा की गुणवतत्ता को बेहद खतरनाक बताते हुए कहा कि हवा की वजह से दिल्ली में लोगों के लिए हेल्थ इमरजेंसी जैसे हालात हो गए हैं. उन्होंने कहा कि आधे दशक से हवा की गुणवत्ता सुधारने के लिए कोशिश हो रही है लेकिन उसका परिणाम शुन्य है. उन्होंने कहा कि मैं 28 साल के युवा को देख रहा हूं जो सिगरेट नहीं पीता लेकिन उसे स्टेज 4 का लंग कैंसर है. उन्होंने कहा कि ये उनके लिए बेहद दुखद अनुभव है. डॉ अरविंद कहते हैं कि कम उम्र में हवा की वजह से अपने मरीजों को अपनी आखों के सामने मरते देखकर उन्हें बहुत गुस्सा आता है.

डॉ. अरविंद ने कहा कि जब उन्होंने 1988 में एम्स ज्वाइन किया था तब 90 फीसदी फेफडों के कैंसर के मरीजों में वजह धूम्रपान होती थी लेकिन अब 50 फीसदी से ज्यादा फेफडे के कैंसर के मरीज वो हैं जो धूम्रपान नहीं करते. उन्होंने कहा कि सिगरेट पीना और जहरीली हवा में सांस लेना दोनों ही उनती ही नुकसानदायक है. आपके आसपास जो हवा है उसका गुणवत्ता को एक्यूआई के माध्यम से जाना जा सकता है और एक्यूएलआई यानी एयर क्वॉलिटी लाइफ इंडेक्स से ये पता लगाया जाता है कि खराब हवा लेने वाला व्यक्ति औसतन कितने दिनों तक जिंदा रहेगा. चीन में ये तकनीक विकसित की गई थी जहां की आबादी दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है.

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