नई दिल्ली : अच्छे दिन से लेकर नया भारत ‘मेक इन इंडिया’ की तर्ज पर 2019 का लोकसभा चुनाव क्या देश में एक नई दिशा तय करेगा, यूपी चुनाव के नतीजों के बाद यह सवाल सबके जहन में आ रहा है. 
 
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन की शर्मनाक हार ने गांधी परिवार की साख को नुकसान पहुंचाया है. इस पराजय ने राहुल गांधी के नेतृत्व के साथ प्रियंका गांधी को भी सवालों के घेरे में ले लिया है क्योंकि चुनाव से पहले प्रियंका के राजनीतिक कौशल की बातें की जा रही थीं. 
 
एक संगठित मोर्चे का ​भविष्य
लेकिन, सवाल यह भी है क्या एक संगठित मोर्चा मोदी के करिज्मा को टक्कर दे सकता है? 2019 के चुनाव में जिसका जवाब आने वाले समय में धीरे-धीरे मिल जायेगा. हालांकि, जाती गणित पर होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव ने इस गणित पर भी सवालिया निशान लगा दिया है. ऐसे में 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी के विकास की क्या नयी दस्तक देगा जो भारत की तस्वीर को बदल सकेगा यह भी देखना होगा .  
 
मोर्चे की सुगबुघाट तो हुई थी लेकिन उत्तर प्रदेश के नतीजों ने फिलहाल इस पर विराम लगा दिया है. उत्तर प्रदेश में भी एक गठबंधन बना था लेकिन नातीजों में सफल नहीं रहा. वहीं, बिहार में महागठबंधन और दिल्ली के चुनावों ने मोदी के अश्वमेध यज्ञ को रोक दिया था. इसी के बाद शुरू हुआ था राष्ट्रीय मोर्चा बनने का दौर, जिसे नोटबंदी के बाद बहुत बल मिला था लेकिन उत्तर प्रदेश के परिणामो नें इस सब पर पानी फेर दिया. 
  
कांग्रेस की बात करें तो उसकी झोली में पंजाब आया है. यह वही पंजाब है जहां राहुल ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस लीडरशिप से कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने के लिए जोर लगाया था. उन्हीं अमरिंदर ने 2013 में कर्नाटक में विजय के बाद कांग्रेस को किसी प्रदेश में पहली जीत दिलाई है. 
 
यूपी में फेल हुआ एक गठबंधन
कांग्रेस को दरअसल सिंह के साथ मणिपुर के दिग्गज नेता इबोबी सिंह और गोवा में पार्टी के कुछ सीनियर नेताओं का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिनका राहुल गांधी जैसे नई पीढ़ी के नेताओं के साथ प्रयोगों को लेकर टकराव रहा. गोवा और मणिपुर में विधानसभा में सीटों के मामले में कांग्रेस बीजेपी से आगे है.
 
दरअसल, सपा-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन राज्‍य में बेहद कमजोर रहा. इस बार कांग्रेस महज सात सीटों पर ही चुनाव जीत‍ सकी. हालांकि, 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 28 सीटें अपने दम पर हासिल की थी. सूबे में कांग्रेस पिछले 28 सालों से सत्‍ता से बाहर है. 
 
 
कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा था कि राहुल गांधी के पद त्यागने का तो सवाल ही नहीं उठता. गोवा में कांग्रेस के इन्चार्ज दिग्विजय सिंह ने कहा ‘नेहरू-गांधी परिवार ही कांग्रेस को एकजुट करता है.’ यूपी में बीजेपी की जीत के बाद बीजेपी, बिहार में नीतीश कुमार को लेकर राजनीतिक खेल खेलने की कोशिश करेगी. 
 
नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के बीच सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और महिला आरक्षण जैसे कई मुद्दों को लेकर नजदीकियां बढ़ी हैं. पटना में प्रकाशोत्सव कार्यक्रम में दोनों एक-दूसरे की तारीफ भी कर चुके हैं. यूपी में भाजपा की सरकार बनने के बाद लालू सरकार पर ज्यादा दवाब बनाने में सफल नहीं होंगे. क्या ऐसे में एक मोर्चा बनना संभव होगा?
 
राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल
अगर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में BJP की जीत ने उसे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए बढ़त दी है, तो अपने गढ़ अमेठी तक में कांग्रेस की शर्मनाक हार ने यह सवाल उठा दिया है कि राहुल 2019 में अपनी लोकसभा सीट भी बचा पाएंगे या नहीं. UP में समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के गठबंधन के पीछे राहुल और प्रियंका का योगदान गिनाया जा रहा था, लिहाजा सवाल भी राहुल के नेतृ्तव पर ही उठ रहे हैं. 
 
403 सीटों वाली उत्तर प्रदेश विधान सभा में कांग्रेस को 7 सीटें मिली हैं जबकि उम्मीदवार 105 पर खड़े किए गए थे. यहां यह गौर करने वाली बात है की अपना दल जैसी क्षेत्रीय पार्टी तक को 9 सीट मिली जबकि उसने मात्र 11 सीट पर चुनाव लड़ा था . 
 
 
क्या आने वाले दिनों में पार्टी के भीतर असंतोष की आवाजें उठ सकती हैं. सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष हैं, लेकिन 2012 से पार्टी असल में राहुल के निर्देशन में काम कर रही है. 2012 के मुकाबले कांग्रेस शासित राज्यों की संख्या घटी ही है. कई राज्यों में पार्टी दूसरे दलों की पिछलग्गू बन गई है. बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड, पश्चिम बंगाल में लेफ्ट पार्टियों और तमिलनाडु में डीएमके के साथ चिपकी हुई है. 
 
कांग्रेस की यूपी में रणनीति विफल
राहुल ने उत्तर प्रदेश में जिस तरह कदम बढ़ाए, उससे दिल्ली और उत्तर प्रदेश में कई कांग्रेस नेता हैरान-परेशान थे. पहले तो राहुल ने सभी अनुभवी नेताओं को किनारे कर चुनावी रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी प्रशांत किशोर को दे दी, फिर उन्होंने संगठन के स्तर पर बिना किसी तैयारी के ‘किसान यात्रा’ शुरू कर दी. इसके साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश में शीला दीक्षित को बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार पेश कर दिया था. 
 
जब राहुल को महसूस हुआ कि प्रयोग सही दिशा में नहीं जा रहा है, तो बीच में ही उन्होंने समाजवादी पार्टी से गठबंधन करने का निर्णय कर लिया जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आगाह कर रहे थे कि समाजवादी पार्टी को सत्ता विरोधी रुझान से जूझना होगा. साथ ही, दोनों दलों में कटुता का पुराना इतिहास रहा है और ऐसे गठबंधन से बीजेपी को गैर यादव ओबीसी को एकजुट करने का खुला मैदान मिल जाएगा. 
 
 
प्रियंका गांधी भी इस गठबंधन में अपने भाई की मदद करने के लिए बैक रूम सपोर्टर के रूप में सक्रिय हुई थीं और इस घटनाक्रम को कांग्रेस के लोगों ने प्रमुखता से हाईलाइट किया था. सोनिया गांधी ने चुनाव प्रचार किया नहीं, लिहाजा कांग्रेस का समूचा प्रचार अभियान इस तरह डिजाइन किया गया, जिसमें राहुल (अखिलेश यादव के साथ) ‘अकेले योद्धा’ के रूप में पेश किए जाएं.
 
ऐसे में राहुल 2019 के चुनाव में कांग्रेस के लिए क्या कोई अलग लकीर खींच पाएंगे? क्या ऐसे में एक नए मोर्चे की रूपरेखा बन पायेगी? 2019 के लोक सभा चुनाव से पहले यह एक बड़ा सवाल है.

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