लखनऊ: यूपी में मोदी लहर पर सवार होकर प्रचंड बहुमत से बीजेपी सत्ता में आ गई है, अब शुरू होगा ‘कौन बनेगा सीएम’ का खेल. हरियाणा और झारखंड में जिस तरह मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने एकदम अप्रत्याशित चेहरों पर दांव लगाया, उससे यूपी में मोदी लहर पर सवार होकर प्रचंड बहुमत से बीजेपी सत्ता में आ गई है, अब शुरू होगा ‘कौन बनेगा सीएम’ का खेल.
 
हरियाणा और झारखंड में जिस तरह मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने एकदम अप्रत्याशित चेहरों पर दांव लगाया, उससे यूपी की जनता ही नहीं राजनीतिक पंडितों तक के बीच ये चर्चा है कि इस बार भी मोदी ऐसा ही ऐलान यूपी के लिए भी कर सकते हैं. चूंकि यूपी का चुनाव भी मोदी के नाम पर लड़ा गया और भारी जीत भी मोदी के नाम पर ही मिली है तो दावेदार भी कोई नहीं है. ऐसे में इनखबर को मिली अंदर की जानकारी के मुताबिक बीजेपी संसदीय बोर्ड की मीटिंग में कुल पांच चेहरों पर ही चर्चा होनी है.
 
जिनमें सबसे पहला नाम है केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का, चूंकि वो खुद संसदीय बोर्ड के सदस्य हैं तो उनको भी इस मीटिंग में होना है. राजनाथ सिंह यूपी के सीएम भी रह चुके हैं, इस वक्त यूपी बीजेपी में ना उनसे ज्यादा कोई कद्दावर नेता है और ना ही उनके अलावा किसी को सीएम की कुर्सी पर रहने का तजुर्बा. ऐसे में माना ये जा रहा है कि क्या राजनाथ यूपी की राजनीति में लौटना चाहेंगे, अगर वो चाहते हैं तो उनकी मर्जी बोर्ड में पूछी ही जाएगी. अगर राजनाथ मना करते हैं, शायद तभी किसी दूसरे नाम पर चर्चा होगी.
 
दूसरा बड़ा नाम है गोरखपुर से सांसद और फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ का, अगर मीडिया ने मोदी और अमित शाह के बाद किसी को यूपी चुनावों में तबज्जो दी और जिसकी डिमांड इन दोनों के बाद बीजेपी प्रत्याशियों ने की तो वो थे आदित्यनाथ. अगर ये मान लिया जाए कि इस जीत में ध्रुवीकरण की भी भूमिका थी, तो आदित्यनाथ इसकी एक बड़ी वजह थे, पलायन, कब्रिस्तान, बिजली आदि के मुद्दे उन्होंने जमकर उठाए. पांच बार सांसद रहने के वाबजूद कोई पद ना लेना, मोदी की तरह परिवार के झंझटों से दूर रहना और हिंदू नायक की छवि ने ही लोगों को ये नारा गढ़ने पर मजबूर किया था कि देश में मोदी, यूपी में योगी. लेकिन उनकी यही हिंदू वादी छवि विकास की बात करने वाली बीजेपी के फैसले को डिगा भी सकती है और उनकी जाति ठाकुर भी.
 
तीसरा नाम है केशव प्रसाद मौर्या का, मौर्या इलाहाबाद से ताल्लुक रखते हैं और विश्व हिंदू परिषद के रास्ते बीजेपी में आए. उनके हक में सबसे बड़ी बात थी कि कोई पिछडी जाति का नेता मोदी की तरह ही बचपन से ही शाखाओं के जरिए संघ परिवार में पला बढ़ा, मनोहर लाल खट्टर की तरह ये सेफ डिसीजन हो सकता है. लेकिन बीजेपी की यूपी की राजनीति में वो अध्यक्ष बनने से पहले तक ज्यादा पहचाना चेहरा नहीं थे. ये अलग बात है कि स्वामी प्रसाद मौर्या, एसपी सिंह बघेल आदि बाहरी नेताओं के साथ भी आने से वो नॉन यादव पिछड़ा वोट को बीजेपी की तरफ खींचने में कामयाब रहे. उनके लिए मुश्किल तब हो सकती है, जब मुकाबले में राजनाथ या योगी जैसा सीनियर नेता हो.
 
चौथा नाम है बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा का, वो लखनऊ के मेयर हैं और केन्द्र के तमाम बडे बीजेपी नेताओं के करीबी रहे हैं, अभी मोदी-शाह के राज्य गुजरात के प्रभारी हैं तो उनकी पैठ को समझ सकते हैं. संघ की पसंद भी रहे हैं. हालांकि योगी और मौर्य़ा जब मुकाबल में हों तो संघ के लिए भी चुनना काफी मुश्किल हो जाएगा. फिर भी आधे यूपी में बीजेपी कार्य़कर्ता भी उन्हें कम ही पहचानते होंगे. ऐसे में उनको फायदा तभी दिख रहा है, जब योगी और मौर्या को लेकर बोर्ड की राय बंट जाए.
 
पांचवा नाम है केन्द्रीय मंत्री महेश शर्मा का, माना ये जा रहा है कि राजनाथ अगर खुद सीएम बनने के इच्छुक नहीं हुए तो महेश शर्मा का नाम आगे कर सकते हैं. वैसे भी राजनाथ के बेटे पंकज के नोएडा में पूरे चुनाव की जिम्मेदारी महेश शर्मा ने ही संभाली. संघ अधिकारियों के चहते हैं, ज्यादातर का इलाज उनके नोएडा के कैलाश हॉस्पिटल में ही होता है. सौम्य छवि के हैं, लेकिन मध्य और पूर्वी यूपी में मंत्री बनने के बाद ही पहचाने जाने लगे हैं. ऐसे में दिनेश शर्मा और वो एक ही पायदान पर हैं.   
 
हालांकि कुछ और नाम चर्चा में हैं, जिनमें से बीजेपी के मीडिया प्रभारी रहकर दिल्ली में बड़े नेताओं के करीब पहुंचने वाले श्रीकांत शर्मा भी शामिल हैं, जो अपने गृहनगर मथुरा से चुनाव जीत गए हैं, यूपी की राजनीति में नया होना और विधायकी का तजुर्बा ना होना नेगेटिव हो सकता है. अगर पिछडों को कमान देने की बात आई तो मौर्या के साथ साथ उमा भारती के नाम पर भी चर्चा हो सकती है, लेकिन उनका केन्द्रीय मंत्रालय अपने बेहतर काम के लिए चर्चा में नहीं रहता. अमित शाह के दाएं हाथ माने जाने वाले और यूपी भाजपा के प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल लगातार लोकसभा और विधानसभा में प्रचंड बहुमत दिलाकर और बूथ के बजाय पन्ना स्तर पर संगठन खड़ा करके चर्चा में हैं, लेकिन उनका खुद का जनाधार नहीं है, विद्यार्थी परिषद के जरिए आए और प्रचारक हैं, लेकिन संभावित चेहरे जरूर हैं. 
 
एचआरडी में राज्य मंत्री रहे आगरा के रामशंकर कथेरिया भी दलित चेहरे के चलते चर्चा में थे, जो अब धीमी पड़ गई हैं. ऐसे ही यूपी के चुनाव प्रभारी ओम माथुर भी अप्रत्याशित चेहरा हो सकते हैं, अगर बाहरी वाली बात ना आए तो. ऐसे में सबकी नजरें कल दिल्ली में होने वाली बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंग पर टिकी हैं.
इसके अलावा गाजीपुर से सांसद मनोज सिन्हा का नाम भी चर्चा में है. उनको हाल ही में राज्य मंत्री से स्वतंत्र प्रभार दिया गया है.
 

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