देहरादून: उत्तराखंड में 15 फरवरी को मतदान है. यहां 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव में करीब 76 लाख मतदाता हैं. 56 लाख ऐसे वोटर हैं जिनकी उम्र 50 साल से कम है. इनमें से क़रीब 21 लाख मतदाता, 20-29 साल के हैं. जबकि 18 लाख वोटर 30-39 साल के हैं. उत्तराखंड में गढ़वाल और कुमाऊं दो मुख्य क्षेत्र हैं. यहां विधानसभा की 41 सीटें गढ़वाल में हैं तो 29 सीटें कुमाऊं में.
 
 
राज्य के नौ पर्वतीय जिलों के पास 34 सीटें
राज्य के नौ पर्वतीय जिलों के पास 34 सीटें हैं. राज्य के चार मैदानी जिलों के पास 36 सीटे हैं. नामांकन वापस लेने की मियाद खत्म होने के बाद बीजेपी के 25 तो कांग्रेस के 28 बागी मैदान में डटे हैं. साल 2007 में बीजेपी की सरकार में पांच साल में तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बदले और साल 2012 की कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में दो बार मुख्यमंत्री बदले गए.
 
 
37 गांवों में कोई युवा वोटर नहीं
कुमाऊं के चंपावत जिले के 37 गांवों में कोई युवा वोटर ही नहीं है. सारे वोटर 60 साल की उम्र के ऊपर के हैं और ये बुज़ुर्ग आबादी भी गिनी चुनी है. एक गांव में बामुश्किल 60-70 की आबादी रह गई है. अनुमान है कि पिछले 16 सालों में करीब 32 लाख लोगों ने अपना मूल निवास छोड़ा है.
 
 
उम्मीदवारों की रिपोर्ट
एसोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफोर्म्स की रिपोर्ट के मुताबिक 637 उम्मीदवार इस बार मैदान में हैं. यह उम्मीदवार 34 राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इनमें से 6 राष्ट्रीय दल, 4 क्षेत्रीय दल,  24 गैर मान्यता प्राप्त दल और 261 निर्दालिये उमीदवार हैं. इनमें से 91 (14 %) अपराधिक मामलो  वाले, 54 (8%) गंभीर अपराधिक मामले वाले उम्मीदवार और 200 (31 %) करोड़पति उम्मीदवार हैं. 
 
 
करोड़पति उम्मीदवार
कांग्रेस के कुल 70 उम्मीदवारों में से 51 करोड़पति हैं जबकि बीजेपी के 70 प्रत्याशियों में से 48 करोड़पति हैं. बसपा के 69 उम्मीदवारों में 19, उक्रांद के 55 उम्मीदवारों में 13, सपा के 20 उम्मीदवारों में चार और 261 निर्दलीय उम्मीदवारों में 53 ने अपने पास एक करोड़ से अधिक की संपत्ति है. 
 
 
सबसे अधिक संपत्ति वाले उम्मीदवार
सबसे अधिक संपत्ति वाले तीन शीर्ष उम्मीदवार बीजेपी के सतपाल महाराज (80 करोड़ रुपए), निर्दलीय मोहन प्रसाद काला (75 करोड़ रुपए) और बीजेपी के शैलेंद्र मोहन सिंघल (35 करोड़ रुपए) हैं. मुख्यमंत्री हरीश रावत के पास छह करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति है. 
 
 
आपराधिक मामले वाले उम्मीदवार
91 उम्मीदवारों ने अपने विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज होने की घोषणा की है.  54 का कहना है कि उनके विरुद्ध गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं. बीजेपी के 19, कांग्रेस के 17, बसपा के सात, उत्तराखंड क्रांति दल के चार, सपा के दो और 32 निर्दलीय उम्मीदवारों ने हलफनामों में अपने आपराधिक मामले चलने की घोषणा की है.
 
 
शिक्षा के मोर्चे पर उम्मीदवार
शिक्षा के मोर्चे पर 256 उम्मीदवारों ने अपनी शिक्षा पांचवीं पास से लेकर 12 वीं पास तक बतायी है. 340 उम्मीदवारों ने स्नातक या उससे अधिक तक की शिक्षा अर्जित करने की घोषणा की है. 393 उम्मीदवार 25-50 वर्ष उम्रवर्ग के हैं जबकि 238 प्रत्याशी 51-80 साल के हैं. चुनाव मैदान में 56 महिला उम्मीदवार भी हैं. 
 
 
हॉट सीट्स – 
 
सितारगंज
बीजेपी- सौरभ बहुगुणा( विजय बहुगुणा के बेटे ) vs कांग्रेस मालती विश्वास  
उधम सिंह नगर की सीट है, बंगाली वोटर्स है इसी सीट से विजय बहुगुणा जीत कर मुख्यमंत्री बने थे
सहसपुर
कांग्रेस पार्टी स्टेट प्रेसिडेंट किशोर उपाध्याय vs  बीजेपी सहदेव पुंडीर   
चौबट्टाखाल
बीजेपी  पूर्व केंद्रीय मंत्री सतपाल महाराज vs  कांग्रेस राजपाल सिंह बिष्ट 
हरिद्वार ग्रामीण सीट
मुख्यमंत्री हरीश रावत vs बीजेपी से मौजूदा विधायक स्वामी यतीश्वरानंद vs बीएसपी से मुकर्रम
त्रिकोणीय मुकाबले में रावत की यह सीट फंसी हुई है.
किच्छा
मुख्यमंत्री हरीश रावत vs बीजेपी राजेश शुक्ल 
जागेश्वर
काग्रेस स्पीकर गोविन्द सिंह कुंजवाल vs  बीजेपी सुभाष पाण्डेय 
रानीखेत
बीजेपी स्टेट प्रेसिडेंट और विपक्ष के नेता अजय भट्ट vs  कांग्रेस कारन महारा रावत के रिश्तेदार   
बाजपुर सीट
बाजपुर सीट से कांग्रेस ने पूर्व बीजेपी नेता जगतार सिंह बाजवा की पत्नी सुनीता टम्टा बाजवा को टिकट देकर आर्य को सामाजिक समीकरण में उलझा दिया है. कांग्रेस के दिग्गज नेता यशपाल आर्य के बीजेपी में आने के चंद घंटों के भीतर बाजपुर से टिकट दे दिया गया. 
नैनीताल  
बीजेपी  संजीव आर्य (यशपाल आर्य के पुत्र vs  कांग्रेस सरिता आर्य 
हल्द्वानी
कांग्रेस इंदिरा हृदयेश  vs बीजेपी  डॉ. जोगेन्द्र सिंह रौतेला   
कोटद्वार
बीजेपी: हरक सिंह रावत vs  कांग्रेस : सुरेंद्र सिंह नेगी
 
 
कोटद्वार विधानसभा सीट 2012 में वो सीट रही, जिस पर हार की वजह से बीजेपी राज्य में 5 साल के लिए सरकार बनाने से चूक गई. 2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की तरफ से यहां तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने चुनाव लड़ा था. लेकिन कोटद्वार सीट के समीकरण और कांग्रेस नेता सुरेंद्र सिंह नेगी का यहां घर और गढ़ होना खंडूरी जैसे भारी-भरकम नेता पर भी भारी पड़ा. 2012 में बीजेपी को कोटद्वार सीट बड़ा झटका दे चुकी है. इसलिए कोटद्वार विधानसभा सीट पर इस बार बीजेपी ने कांग्रेस छोड़कर पार्टी में शामिल हुए औऱ बागियों के सरदार कहे जाने वाले हरक सिंह रावत को यहां से उम्मीदवार बनाया हैं. 
 
 
यहां के मुद्दे
पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली जैसे पारंपरिक मुद्दे ही हैं. हालांकि नोटबंदी भी इनमें जुड़ गया है. डॉक्टर नहीं थे आज भी नहीं है. प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ को तहस-नहस कर दिया है. लोग मैदानी इलाकों में आ रहे हैं. शहरों में नागरिक सुविधाएं घट रही हैं. ट्रैफिक समस्या बढ़ गई है. शहरों पर दबाव बढ़ रहा है. लोगों ने नाल खाले तक कब्जा लिए हैं. पलायन हो रहा है. लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा है. पहाड़ों में रहना दूभर हो गया है. 
 
 
प्राकृतिक आपदा तो है ही, जंगली पशुओं का हमला और घुसपैठ रिहाइशी इलाकों में बढ़ रही है. जहां थोड़ा बहुत खेती है वहां बंदरों और सुअरों का उत्पात हो गया है. मैदानी इलाकों में बड़े पैमाने पर खेतिहर लोग हैं लेकिन नोटबंदी ने उनकी कमर तोड़ दी है. ये सब इतने जेनुइन मुद्दे हैं लेकिन इनके बावजूद चुनावी लड़ाई बनाम की हो गई है. प्रदेश की कानून-व्यवस्था, सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी और विकास का मुद्दा प्रमुख रहने वाला है. 
 
 
चुनावी अखाड़े में किस्मत आजमा रहे चेहरों ने खेमा बदल लिया है, इसलिए विकास या भ्रष्टाचार के मुद्दे पूरी तरह गौण हो गए हैं. पहले बीजेपी जिन्हें भ्रष्टाचारी कहकर आंदोलन कर रही थी, अब वही चेहरे उसके हमराही हो गए हैं. बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो गया है तो कांग्रेस ने भी बीजेपी के बागियों को गले लगा लिया है. स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और यातायात यहां की मुख्य समस्या है.
 
 
चुनाव में बागी मुश्किल बने
उत्तराखंड में बीजेपी के लिए कई सीटों पर बागी मुश्किल बने हैं. कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए सतपाल महाराज चौबटाखाल से लड़ रहे हैं. बीजेपी ने महाराज को लड़ाने के लिए अपने नेता तीरथ सिंह रावत का टिकट काटा. रावत चुनाव तो नहीं लड़ रहे लेकिन उनके ‘करीबी’ कहे जाने वाले कवीन्द्र इस्टवाल खड़े हो गए हैं और यहां से सतपाल महाराज के लिए सिरदर्द हैं.
 
 
उधर, नरेंद्र नगर सीट पर बीजेपी ने कांग्रेस से आए सुबोध उनियाल को टिकट दिया जिनके सामने बीजेपी के बागी ओम गोपाल रावत खड़े हो गए हैं. कांग्रेसी से भाजपाई बने हरक सिंह रावत की वजह से बीजेपी के शैलेन्द्र रावत ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस में आ गए. 
 
 
हरक सिंह रावत को बीजेपी ने कोटद्वार से टिकट दिया जहां से शैलेन्द्र रावत लड़ना चाहते थे. कांग्रेस ने तुरंत शैलेन्द्र रावत को गढ़वाल की यमकेश्वर सीट से टिकट दे दिया. बताया जा रहा है कि शैलेन्द्र रावत के समर्थक कोटद्वार में अब हरक सिंह के खिलाफ काम में लग गए हैं.

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