नई दिल्ली: मुलायम सिंह यादव ने 25 साल पहले जब जनता दल से तोड़कर समाजवादी पार्टी बनाई थी, तो बिलकुल नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनकी पार्टी भी टूट के कगार पर खड़ी होगी और दूसरी पार्टी का मुखिया होगा उस समय केवल 19 साल का उनका बेटा अखिलेश.
 
अब अखिलेश से कांग्रेस के टाईअप की बात चल रही हैं, जिनकी पार्टी कांग्रेस खुद अब तक साठ से ज्यादा बार टूट चुकी है और इस टूटन की शुरूआत भी नेहरू-गांधी परिवार के सबसे पुराने राजनीतिज्ञ और इंदिरा गांधी के दादा मोती लाल नेहरू ने ही की थी. जी हां, अब तक 60-65 बार टूट चुकी है कांग्रेस और उसकी शुरूआत उसी गांधी नेहरू परिवार के मुखिया ने की थी, जो आज कांग्रेस पर काबिज है.
 
आजादी से पहले मोतीलाल नेहरु और बोस ने तोड़ी थी पार्टी
यूं तो 1907 में ही कांग्रेस में पहली फूट पड़ी थी, गरम दल और नरम दल के बीच का विवाद काफी बढ़ गया था, लेकिन बात नई पार्टी की नहीं आ पाई। हां, हर नेता कोई ना कोई सामाजिक संगठन जरूर बना लेता था. 1922 में जब असहयोग आंदोलन के दौरान चौरी चौरा कांड हुआ, थाने में बंद करके कई पुलिस वालों को जिंदा जला दिया गया तो गांधीजी ने फौरन आंदोलन वापस ले लिया.
 
इससे खफा होकर ढेर सारे युवाओं ने कांग्रेस से पल्ला झाड़कर क्रांतिकारी संगठन बना लिए तो जवाहर लाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास ने एक नई पार्टी खड़ी की, जिसे दिसम्बर 1922 में तो नाम दिया गया था खिलाफत स्वराज पार्टी, 9 जनवरी 1923 को उसे स्वराज पार्टी कहा गया. गांधीजी तो जेल चले गए, लेकिन कई कांग्रेसी इससे जुड़ गए, कई जगह काउंसिल के चुनाव स्वराज पार्टी ने जीते भी, यहां तक सेंट्रल असेम्बली के प्रेसीडेंट भी स्वराज पार्टी से ही बिट्ठल भाई पटेल बन गए. लेकिन मोतीलाल के खुद के बेटे जवाहर लाल, बल्लभ भाई पटेल और राजेन्द्र प्रसाद उनके खिलाफ ही रहे. बाद में दोनों बाप-बेटा मोतीलाल और जवाहर लाल क्रमश: 1928 और 1929 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने.
 
जब गांधीजी जेल से आए तो उन्होंने सबको वापस लाने की कवायद की, इधर चितरंजन दास की 1925 में मौत हो गई। मोतीलाल भी कुछ शर्तों के साथ वापस कांग्रेस में आ गए, पार्टी कुछ कुछ इलाकों में कई सालों तक चलती रही, धीरे धीरे सभी वापस आ गए. 16 साल बाद यानी 1939 में कांग्रेस से इस्तीफे के दो महीने बाद सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस के अंदर ही फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना कर दी. कोलकाता में हुई रैली में उन्होंने कार्यकर्ताओं को अनोखी शपथ दिलाई, अपनी उंगली काटकर ज्वॉइनिंग फॉर्म पर खून से हस्ताक्षर करवाकर ये शपथ लेने को कहा कि अंग्रेजों को कभी पीठ नहीं दिखाएंगे. अगले साल उसे उन्होंने पॉलटिकल पार्टी में तब्दील कर दिया, लेकिन दस दिन के अंदर उन्हें गिरफ्तार करके नजरबंद कर दिया गया, जहां से वो निकल भागे और फिर सिंगापुर में आजाद हिंद फौज बनाई. बाद में उनके भाई शरत चंद्र बोस की मदद से बंगाल के कम्युनिस्ट नेताओं ने वो पार्टी चलाई.
 
जब आज़ादी के बाद टूटी कांग्रेस 
देश की आजादी के बाद 1951 में कांग्रेस से टूटकर बनी किसान मजदूर प्रजा पार्टी, जिसे उस बंदे ने बनाया जो गांधीजी के काफी करीबी था और देश की आजादी के वक्त कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष था, नाम था जे बी कृपलानी. जब वो पटेल समर्थित उम्मीदवार पुरुषोत्तम टंडन से 1950 में चुनाव हार गए तो इस्तीफा देकर नई पार्टी बना ली. इस पार्टी ने देश का पहला लोकसभा चुनाव 1951 में 16 सीटों पर लड़ा और 9 लोकसभा सीट्स जीत भी लीं. लेकिन अगले साल ही इसका विलय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाने के लिए सोशलिस्ट पार्टी में हो गया. 1951 में ही कांग्रेस से टूटकर दो क्षेत्रीय पार्टियां और बनीं, पहली हैदराबाद स्टेट प्रजा पार्टी जो बाद में कृपलानी की पार्टी में मिल गई और दूसरी थी गुजरात की सौराष्ट्र खेदूत संघ जिसका बाद में स्वतंत्र पार्टी में विलय हो गया.
 
तीन साल बाद यानी 1956 में कांग्रेस तोड़कर इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक कांग्रेस बनाई आजाद भारत के पहले और आखिरी गर्वनर जनरल सी राजगोपालाचारी ने. तमिलानाडु के कांग्रेस नेता कामराज से विवाद के बाद उन्होंने कांग्रेस रिफॉर्म कमेटी के नाम से पार्टी बनाकर तमिलनाडु में ही फ़रवर्ड ब्लॉक से हाथ मिलाया, बाद में उसका नाम बदलकर इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक कांग्रेस  कर लिया और कुछ चुनाव भी लड़े. फिर बाद में स्वतंत्र पार्टी में विलय कर लिया.
 
राजगोपालाचारी ने ही कुछ और पार्टियों को मिलाकर 1959 में बनाई स्वतंत्र पार्टी, नेहरू की समाजवादी नीतियों के खिलाफ 21 प्वॉइंट्स का एजेंडा बनाया, जमींदारों, राज खो चुके राजाओं के समर्थन की वजह से नेहरू ने उसका विरोध किया. लेकिन 1962 के चुनाव में इस पार्टी को 6.8 परसेंट वोट मिला और 18 लोकसभा सीट पर जीत. चार राज्यों बिहार, गुजरात, उड़ीसा और राजस्थान में यह मुख्य विपक्षी पार्टी भी बन गई. 1967 के चुनाव में वोट परसेंट 2 फीसदी और बढ़ गया और कुल 44 लोकसभा सीट इस पार्टी के हिस्से आईं. 1971 में इंदिरा गांधी के सामने इसकी चमक फीकी पड़ गई, 8 सीट पर सिमट गई, अगले साल राजगोपालाचारी के मरते ही पार्टी नेताविहीन हो गई और चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल में इसका विलय हो गया.
 
साठ के दशक में कई क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से निकलीं, 1964 में केरला कांग्रेस, 1966 में उड़ीसा जन कांग्रेस आदि. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण था इंदिरा कांग्रेस का बनना. समझिए अखिलेश का झगड़ा उसी इतिहास को दोहरा रहा है, बशर्ते अंजाम भी वही हो. कामराज, मोरारजी देसाई और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष एस निंजालिंगप्पा से विवाद होने के बाद निंजालिंगप्पा ने इंदिरा को पार्टी से निकाल दिया, 1969 में पार्टी के दो फाड़ हो गए. इंदिरा ने बनाई कांग्रेस (आर यानी Requisition) तो कामराज और मोरारजी ने बनाई कांग्रेस (ओ यानी Organisation).
 
इनमें भी चुनाव चिह्न को लेकर झगड़ा था. पार्टी का सिम्बल दो बैलों की जोड़ी कामराज की कांग्रेस को असली मानकर दे दिया गया तो इंदिरा की कांग्रेस आर को 1971 के चुनाव में गाय और दूध पीता बछड़ा मिला. इंदिरा गांधी की पार्टी को मिली ऐतिहासिक जीत, 518 में से 358 सीटें, उसके बाद चुनाव आयोग ने उसी को असली कांग्रेस मानकर दो बैलों वाला सिम्बल इंदिरा को दे दिया. जबकि कांग्रेस ओ बाद में जनता पार्टी में मिल गई.
 
1959 के नागपुर अधिवेशन में यूपी के किसान नेता चौधरी चरण सिंह ने जब नेहरू की इकोनोमिक पॉलिसीज का खुलकर विरोध किया था, वो चर्चा में आ गए थे, लेकिन लगातार विरोध के चलते वो कांग्रेसियों की आंख की किरकिरी बन गए. 1967 मे उन्होंने राम मनोहर लोहिया और राज नारायण के सहयोग से भारतीय क्रांति दल बनाया, 1967 और 1970 में दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने. 1974 मे उन्होंने सात पार्टियां क्रांति दल, स्वतंत्र पार्टी, उत्कल कांग्रेस आदि मिलाकर एक नई पार्टी बना ली भारतीय लोक दल. 1975 की इमरजेंसी में वो गिरफ्तार हुए और 1977 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार में वो उप प्रधान मंत्री और ग्रह मंत्री बने और बाद में 24 दिन के पीएम भी.
 
1967 में बांग्ला कांग्रेस, 1968 में मणिपुर प्यूपिल्स पार्टी और 1969 में कांग्रेस से तोड़कर बीजू पटनायक ने उत्कल कांग्रेस बनाई. 1977 में मीरा कुमार के पिता जगजीवन राम ने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई, ये चारों पार्टियां बाद में जनता पार्टी में ही मिल गईं. 1969 में बनी तेलंगाना प्रजा समिति बाद में कांग्रेस में ही मिल गई.
 
1978 में देवराज उर्स ने इंडियन नेशनल कांग्रेस उर्स बनाई, जिसमें उनके साथ एंटोनी, शरद पवार, देवकांत बरुआ, प्रियरंजन दास मुंशी और शरत चंद्र सिन्हा जैसे बड़े नेता जुड़े. लेकिन दिलचस्प था ए के एंटोनी का पार्टी बनाना, इंका उर्स से तोड़कर एंटोनी ने केरला में पार्ठी बनाई कांग्रेस (ए), जो 1982 में आकर वापस कांग्रेस से मिल गई, शरद पवार ने कांग्रेस सोशलिस्ट यानी कांग्रेस (एस) बनाई, शरद चंद्र सिन्हा ने अपनी कांग्रेस एस बनाई. शरद पवार तो 1986 में कांग्रेस से मिल गए, लेकिन शरद सिन्हा की पार्टी 1999 में आकर शरद पवार की दूसरी पार्टी एनसीपी से आकर मिली.
 
80 के दशक में छह बार टूटी कांग्रेस 
 
80 के दशक में भी कांग्रेस 6 बार टूटी. जगजीवन राम भी जनता पार्टी के बाद कांग्रेस उर्स में ही शामिल हो गए थे, लेकिन डा. देवराज से बात बिगड़ी तो 1981 में देवराज ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया, तो उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस (जगजीवन) बना ली, जो 1986 में उनकी मौत के बाद खत्म हो गई. यूं तो 1988 में दादा साहब फाल्के अवार्ड विजेता और साउथ के अभिनेता शिवाजी गणेशन ने भी तमिलनाडु में कांग्रेस से तोड़कर तमिझ्गा मुन्नेत्र मुन्नानी पार्टी बना ली थी, लेकिन चुनावों में हार के बाद उन्होंने जनता दल में अपनी पार्टी का विलय कर लिया.
 
सबसे दिलचस्प था प्रणब मुखर्जी का अपनी पार्टी बनाना, दरअसल इंदिरा की मौत के बाद प्रणव को लगा कि इंदिरा की जगह नेता उन्ही को चुना जाएगा, लेकिन जब राजीव को पीएम बनाया गया और उनको किनारे कर बंगाल कांग्रेस में भेज दिया गया तो 1986 में उन्होंने अलग पार्टी बना ली, नाम रखा राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस. उनके साथ कोई बड़ा नेता नहीं आया, 1989 के चुनाव में मिली तगड़ी हार तो राजीव का बढ़ा हुआ हाथ थामकर वो वापस कांग्रेस में आ गए.
 
नब्बे के दशक में कांग्रेस को बड़ा झटका दिया था कभी संजय गांधी के करीबी रहे वंशी लाल ने, हरियाणा विकास पार्टी बनाकर. 2004 में ये पार्टी फिर से कांग्रेस में मिल गई। दूसरा झटका दिया नारायण दत्त तिवारी ने ऑल इंडिया कांग्रेस (तिवारी) बनाकर, उनके साथ अर्जुन सिंह और नटवर सिंह भी चले गए. केवल 800 वोट से हारने के चलते वो 1991 में पीएम बनने से रह गए. 1994 में उन्होंने नई पार्टी बना ली, लेकिन सोनिया के पार्टी संभालते ही वो वापस आ गए, पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया.
 
1994 में बंगारप्पा की कर्नाटक कांग्रेस, 94 में ही तमिलनाडु में तमिझ्गा राजीव कांग्रेस, 1996 में जीके मूपनार की तमिल मनीला कांग्रेस, अरुणाचल प्रदेश में गेगांग अपांग की अरुणाचल कांग्रेस और सबसे दिलचस्प माधव राव सिंधिया की मध्यप्रदेश विकास कांग्रेस अस्तित्व में आईं, सभी पार्टियां बाद में कांग्रेस में ही मिल गईं, नेता मना लिए गए. सिंधिया का टिकट कटा तो उन्होने नई पार्टी से सीट जीतकर दिखलाई और दो साल बाद उन्हें मनाकर वापस लाया गया.
 
 
90 के ही दशक में कुछ और नेताओं ने कांग्रेस से तोड़कर पार्टियां बनाईं, लेकिन वो जल्द ही वापस कांग्रेस में मिल गईं, जैसे शीशराम ओला की कांग्रेस (सेकुलर), सुरेश कलमाडी की महाराष्ट्र विकास अघाड़ी, मुकुल मित्थी की अरुणाचल कांग्रेस (मित्थी) आदि. लेकिन 90 के दशक में कांग्रेस से टूटकर बनी तीन बड़ी पार्टियां आज भी जिंदा हैं, जिनमें से दो अभी भी अपने अपने प्रदेश में सरकार में हैं, 1997 में बनी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस, 1999 में सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे पर शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और 1999 में ही बनी मुफ्ती मोहम्मद सईद की पीडीपी. हालांकि फ्रांसिस डिसूजा की गोवा राजीव कांग्रेस और बिहार में जगन्नाथ मिश्रा की भारतीय जन कांग्रेस भी इसी दशक में बनी थी, जो एनसीपी में मिल गईं, मणिपुर स्टेट कांग्रेस बाद में आरजेडी में मिल गई.
 
पिछले 17 सालों में 17 बार टूटी है कांग्रेस 
 
दिलचस्प बात ये है कि 2000 से लेकर 2017 तक कांग्रेस से टूटकर कुल 17 ही नई पार्टियां अब तक बन चुकी हैं. 2000 में फ्रांसिस्को सरदिन्हा ने बनाई गोवा प्यूपिल्स कांग्रेस जो बाद में कांग्रेस में ही मिल गई. 2001 में तीन पार्टियां कांग्रेस से निकलीं, पी कन्नन की पांडिचेरी मक्कल कांग्रेस, तमिलनाडु में कुमारी अनंतन की थोंडर कांग्रेस और सबसे दिलचस्प थी पी चिदम्बरम की कांग्रेस जननायक्य पेरावई, तमिल मनीला कांग्रेस में जा चुके पी चिदम्बरम ने टीएमसी को तोड़कर ये पार्टी तमिलनाडु मे बनाई थी क्योंकि टीएमसी ने एआईडीएमके के साथ टाईअप कर लिया था। 2004 में उन्होंने पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया और उसी साल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता.
 
2002 में भी तीन नई पार्टियां कांग्रेस नेताओं ने बनाईं, महाराष्ट्र में विदर्भ जनता कांग्रेस जो अभी भी एक्टिव है, गोवा में कांग्रेस (शेख हसन) जो बाद में बीजेपी में मिल गई और गुजरात में मुख्यमंत्री रहे छबील दास मेहता ने बनाई गुजरात जनता कांग्रेस जो बाद मे एनसीपी में मिल गई. 2003 में कांग्रेस (डोलो) बनी, जो बाद में बीजेपी में मिल गई. 2005 में दो पार्टियां बनीं, पी कन्नन ने बनाई पांडिचेरी मुन्नेत्र कांग्रेस और के करुणा करण की डेमोक्रेटिक इंदिरा कांग्रेस (के), जिसका बाद में कांग्रेस में ही विलय हो गया. 2007 में भजन लाल ने कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा जनहित कांग्रेस (बीएल) बनाई थी, जिसका विलय 9 साल बाद उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने वापस कांग्रेस में 2016 के अप्रैल में कर दिया.
 
2008 में सोमेन्द्र नाथ मित्रा ने बंगाल में प्रगतिशील इंदिरा कांग्रेस शुरू की, जो बाद में ममता की पार्टी में मिल गई. लेकिन 2011 से 2016 तक बनी पांचों पार्टियां अभी भी एक्टिव हैं, जिनमें जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस, पुदुचेरी में एन रंगास्वामी की ऑल इंडिया एन आर कांग्रेस, आंध्र में नल्लरी किरण की जय समिक्यांध्र पार्टी, जीके वासन की तमिलनाडु में तमिल मनीला कांग्रेस और पिछले साल छत्तीसगढ़ में शुरू हुई अजीत जोगी की छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस.
 
अजीत जोगी भी एक दौर में कांग्रेस के दिग्गज नेशनल लीडर हुआ करते थे. ज्यादातर नेताओं को कांग्रेस नाम से बड़ा लगाव था, जो उनकी नई पार्टी के नाम में भी चिपका हुआ था, इसके जरिए वो कांग्रेस के परम्परागत वोटर को भी खींचना चाहते थे, उनमें से ज्यादातर बड़े नेता वापस आ भी गए और जो नहीं आए वो कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक कब्जाए बैठे हैं.

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