नई दिल्ली, आज हम आपको एक ऐसी बुजुर्ग विधवा मां के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी खुद की तो कोई संतान नहीं है, लेकिन शीला अम्मा जो दूध बेचती हैं वही क्षेत्र के शिशुओं की रगों में दौड़ता है. शीला महिला सशक्तीकरण का जीता-जागता उदाहरण हैं.

दूध वाली माँ की कहानी

विवाह के एक साल बाद ही दूध वाली माँ उर्फ़ शीला के पति की मौत हो गई. इसके बाद से वह साइकिल से गांव-गांव जाकर दूध बेचकर अपना जीविकोपार्जन कर रही हैं. आज उनकी उम्र लगभग 63 वर्ष हो गई है, लेकिन उम्र को मात देकर वह आत्मनिर्भर बनीं और किसी के आगे हाथ फैलाने की बजाय खुद साइकल से दूध बेचने निकली. गांवो में प्यार से लोग उन्हें शीला बुआ और शीला बहन कहते हैं, तो कुछ लोग उन्हें अम्मा भी बोलते हैं. इस बारे में शीला देवी खुश हो कर बताती हैं कि छोटे-छोटे बच्चे मुझे अब दादी मां भी बोलने लगे है.

शीला देवी कैसे बनी दूध वाली माँ

कहते हैं अगर पृथ्वी पर मां नहीं होती तो संपूर्ण पृथ्वी पर कोई होता ही नहीं. कासगंज जनपद की सहावर तहसील के गांव खेड़ा की रहने वाली शीला देवी की शादी 1980 में हुई थी, शादी के एक साल बाद ही उनके पति की मौत हो गई. इतनी कम उम्र में मानो जैसे उन पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा, पति की मौत के बाद शीला देवी वापस अपने पिता के घर आ गई, यहाँ उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए खेती-बाड़ी में पिता का हाथ बटाना शुरू किया.

अभी धीरे-धीरे शीला देवी की जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ ही रही थी कि एक साल में ही उनके पिता और मां की मौत हो गई. पहले पति फिर मां-बाप की मौत ने उन्हें झंकझोर कर रख दिया, मगर शीला देवी के मजबूत इरादों ने हार नहीं मानी. जीविकोपार्जन के लिए उन्होंने एक-दो भैंसें खरीदी और फिर दूध के काम की शुरुआत करते हुए पास के ही कस्बों में साइकल से दूध बेचने जाने लगीं. आज वह 23 वर्ष बाद 63 साल की उम्र में भी उतनी ही निष्ठा से साइकिल से घर-घर और दुकान-दुकान जाकर दूध बेचती हैं.

 

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