नई दिल्ली. महाराष्ट्र के बीड जिले में कई दशकों से होली  के त्योहार पर एक अनोखी परंपरा चली आ रही है. इस परंपरा के तहत ‘चुने गए दामाद’ को गधे पर बिठाकर गांव का चक्कर लगवाया जाता है. दामाद को बाद में सोने की अंगूठी और नए कपड़ें दिए जाते हैं. लेकिन इस बार कोरोना के खतरे को देखते हुए गांव में होली पर इस परंपरा का आयोजन नहीं किया जा रहा है.

बता दें कि ये परम्परा बीड की केज तहसील के विडा येवता गांव में करीब 80 साल से चल  रही है. गांव वालों के मुताबिक दामाद को गधे पर बिठाकर गांव का चक्कर लगवाने के बाद उसे उसकी पसंद के कपड़े दिए जाते हैं. गधे पर दामाद की सवारी देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी लोग यहां आते हैं गधे पर सवारी गांव का चक्कर काटने के बाद सुबह 11 बजे गांव के मंदिर पर खत्म होती है.  

इसके बाद दामाद के ससुर उसका मुंह मीठा कराते हैं और सोने की अंगूठी भेंट करते हैं. फिर उसे नए कपड़े दिए जाते हैं. . इस बार कोरोना को देखते हुए एहतियात के तौर पर कई तरह की बंदिशें लागू है. होली पर महाराष्ट्र में हर जगह विशेष सतर्कता बरती जा रही है. इसलिए इस साल होली पर गांव वालों ने इस परंपरा को न मनाने का फैसला किया है.  

ऐसे चुना जाता है दामाद

 गांव के ही रहने वाले धनराज पवार के मुताबिक करीब 180 दामाद हैं जो गांव में ही अब बस गए हैं और यहीं काम-धंधा करते हैं. करीब 11,000 की आबादी वाले इस गांव में दामादों को शॉर्टलिस्ट करने का काम होली के कई दिन पहले शुरू हो जाता है. पहले 10 दामादों की लिस्ट तैयार होती है फिर उसमें से एक दामाद को चुना जाता है. कई दामाद चुने जाने पर ऐसा करने के लिए मना कर देते हैं. तकरार भी होती है. फिर गांव के बड़े बुजुर्ग और दोस्त उन्हें समझाते हैं. कई बार तो होली से पहले  कुछ दामाद गांव छोड़कर दूर जाकर कहीं छुप गए. उन्हें ढूंढ निकाला गया और स्पेशल गाड़ी भेजकर वापस गांव लाया गया.

 दामाद ने बताया अपना अनुभव

42 साल के दत्तात्रेय गायकवाड़ पिछले साल होली पर गधे पर बिठा जुलूस निकाले जाने का अनुभव झेल चुके हैं. उन्होंने आजतक को बताया, ‘मुझे पहले ही भनक लग गई थी कि मुझे चुना गया है, इसलिए मैं भाग छिप रहा था. विडा येवता गांव से मेरा पैतृक गांव मसाजोग करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर है. मसाजोग के बस स्टैंड से मैं कही दूर जाने की फिराक में था. वहीं मुझे विडा येवता गांव की टोली ने पकड़ लिया. मुझे गधे पर बैठने से डर लग रहा था. लेकिन फिर गांव वालों और रिश्तेदारों ने समझाया कि ये एक परंपरा है. हर दामाद को गधे पर बैठना ही होता है. इस बार तुम्हारा नंबर लगा है. हालांकि गधे पर सवार होने के बाद मेरा सारा डर दूर हो गया था. दो-तीन घंटे मुझे घुमाया गया, रंग लगाया गया, गालियां भी सुनने को मिलीं, लेकिन सब हंसी मजाक के माहौल में हो रहा था.’

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