नई दिल्ली. बीजेपी के चाणक्य अमित शाह का गेम प्लान कर्नाटक में पूरी तरह नहीं चला. कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए शाह ने जो बिसात बिछाई थी, उसे उन्हें की चाल से कांग्रेस ने शह देकर मात भी दे दी. अमित शाह जिस स्टाइल की पॉलिटिक्स करते हैं, उसमें कर्नाटक जैसी हार की गुंजाइश नहीं होती लेकिन बीजेपी अपनी रणनीति को लेकर इतनी ओवर कॉन्फिडेंस थी कि उसने इस बात की ओर ध्यान ही नहीं दिया कि कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को डी के शिवकुमार के ठिकाने पर रखा गया है और डी के शिवकुमार को महारत हासिल है कि इन हालात में किलेबंदी कैसे की जाती है.

बीजेपी को ले डूबी किसकी मोनोपोली ? कर्नाटक में येदियुरप्पा ने जब सरकार बनाने का दावा पेश किया था, तो बीजेपी के सभी नेता दावा कर रहे थे कि येदियुरप्पा 101 परसेंट बहुमत साबित कर देंगे. ये दावा बहुमत परीक्षण से चार घंटे पहले तक चल रहा था. हालांकि उस वक्त भी कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक- आनंद सिंह और प्रताप गौड़ा पाटिल ही बीजेपी की पहुंच में थे. वक्त फिसलने लगा तो येदियुरप्पा ने मन बना लिया कि सदन में हारने से बेहतर है इस्तीफा देना. उन्होंने वही किया. येदियुरप्पा के इस्तीफा देने के बाद बीजेपी नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के ट्वीट काबिले गौर हैं.

स्वामी ने लिखा- ‘कर्नाटक के घटनाक्रम में असली मुद्दा ये है कि बीजेपी ने जीत के जबड़े से हार को खींच निकाला. एकाधिकार और अहंकार इसकी वजह है.’ स्वामी ने इसके बाद एक और ट्वीट किया- ‘इतिहास का सबकः नेपोलियन और हिटलर दोनों एक के बाद एक जंग जीत रहे थे. फिर सेंट पीटर्सबर्ग में जर्मन के हारते ही तुषारापात हुआ और पेट खराब होने से नेपोलियन और फ्रेंच सेना वॉटरलू में हार गईं.’ स्वामी का इशारा किसकी ओर है, ये तो वही जानें लेकिन कर्नाटक में जिस तरह से बहुमत का जुगाड़ करने की जिम्मेदारी सीधे येदियुरप्पा ने संभाल रखी थी और अमित शाह की हरी झंडी के बिना ऐसा मुमकिन नहीं था.

फिर कांग्रेस के संकटमोचक बने डीके शिवकुमार

येदियुरप्पा अपने ओवर कॉन्फिडेंस के शिकार हो गए. उन्हें यकीन था कि 2009 के ऑपरेशन कमल की तरह इस बार भी वो कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोड़ लेंगे. इस मुगालते में बीजेपी के किसी दिग्गज ने ध्यान ही नहीं दिया कि कांग्रेस और जेडीएस के विधायक इस बार डी के शिवकुमार की पहरेदारी में हैं. ये वही डी के शिवकुमार हैं, जिन्होंने गुजरात में राज्यसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस के विधायकों को अपने रिसॉर्ट में पनाह देकर टूटने से बचाया था और अहमद पटेल को जीतने का मौका दिया.

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2002 में जब महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख की सरकार पर ऐसा ही संकट आया था, तब भी कांग्रेस के संकटमोचक की भूमिका डी के शिवकुमार ने ही निभाई थी. डी के शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जिन्होंने कांग्रेस का साथ कभी नहीं छोड़ा, ना ही पार्टी का भरोसा तोड़ा. इस बार भी वो भरोसे पर खरे उतरे. खबर है कि डी के शिवकुमार को मिशन कर्नाटक को कामयाबी से अंजाम देने के लिए राहुल गांधी ने कर्नाटक कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने का फैसला किया है.

वक्त भी अमित शाह के साथ नहीं !

कर्नाटक में सरकार बनाने से लेकर येदियुरप्पा के इस्तीफे का जो नाटक चला, उसमें वक्त ने अहम भूमिका निभाई. येदियुरप्पा को राज्यपाल ने बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया था. केंद्र में अपनी सरकार, तमाम केंद्रीय एजेंसियां अपने पास और कर्नाटक की सत्ता की कमान हाथ में आने के बाद अमित शाह को यकीन था कि येदियुरप्पा अपने लिए बहुमत का जुगाड़ कर लेंगे. गोवा, मणिपुर और मेघालय में बीजेपी ने क्षेत्रीय नेताओं के बूते ही बहुमत का जुगाड़ किया था. बीजेपी इस बात से भी निश्चिंत थी कि गोवा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी उसके पक्ष में फैसला दिया था. इस भ्रम में बीजेपी ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया कि गोवा और कर्नाटक के हालात अलग हैं.

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बीजेपी ने भूलवश ऐसा किया हो, ये नहीं माना जा सकता क्योंकि बीजेपी के सभी प्रवक्ता 15 मई से ही दलील दे रहे थे कि कर्नाटक और गोवा के हालात अलग हैं, दोनों की तुलना नहीं की जा सकती. मामला जब सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने बिना देरी किए बहुमत साबित करने को कहा, तो ये साबित हो गया कि हालात अलग हैं. गोवा की तरह कर्नाटक में बीजेपी को वॉकओवर नहीं मिला था. वहां बहुमत के आंकड़े के साथ कुमारस्वामी ने सरकार बनाने की दावेदारी पेश कर रखी थी. सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही फ्लोर टेस्ट का वक्त कम किया, वैसे ही ये साफ होने लगा था कि अब वक्त बीजेपी और शाह के साथ नहीं है.

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कर्नाटक में जो हुआ, अब उसका असर 2019 के चुनाव में साफ-साफ नज़र आएगा. कर्नाटक में येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस इसका इशारा कर चुकी है. राहुल गांधी ने साफ कहा कि कांग्रेस और पूरा विपक्ष एक साथ मिलकर बीजेपी को हराएगा. मतलब यही है कि कांग्रेस को अंदाज़ा हो चुका है कि बीजेपी और मोदी को कांग्रेस अकेले नहीं हरा सकती. इस सच्चाई को कबूल करने के बाद अब कांग्रेस ज्यादा खुले दिल से गठबंधन की ओर बढ़ेगी. कर्नाटक से इसकी शुरुआत हो चुकी है.

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