नई दिल्ली: कर्नाटक में भी कांग्रेस हार गई. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के पूरा जोर लगाने के बावजूद कांग्रेस हार गई. बीजेपी इसे राहुल गांधी की हार के तौर पर प्रचारित करेगी लेकिन सच ये है कि कांग्रेस की हार के लिए राहुल गांधी नहीं, बल्कि पूरी कांग्रेस पार्टी ही जिम्मेदार है. 2014 के चुनावों में दुर्गति के बावजूद कांग्रेस की हार पर हार हो रही है, क्योंकि कांग्रेस के किसी नेता ने हार से सबक नहीं सीखा.

हारते रहे, फिर भी नहीं सुधरे!

कांग्रेस की लगातार हार के बावजूद पार्टी के शीर्ष नेताओं के तेवर नहीं बदले. राहुल गांधी समेत संगठन में जितने भी बड़े नेता हैं, वो सब सत्ता का सुख इतने लंबे समय तक भोग चुके हैं कि उन्हें विपक्ष में रहने का शऊर नहीं पता. विपक्ष में होते हुए भी कांग्रेस नेताओं का ‘माइंड सेट’ सत्ताधारी दल के नेता जैसा ही रहा. बीजेपी ने इसी बात का फायदा उठाया. विपक्ष के नेता के तौर पर कांग्रेस ने जब भी मोदी सरकार पर सवाल उठाया, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी टीम ने इस कदर पलटवार किया कि कांग्रेसी नेता सवाल उठाना भूलकर सफाई देने की मुद्रा में आ गए. चाहे नोटबंदी का मामला हो, जीएसटी लागू करने में हुई खामियों का, अर्थव्यवस्था का या विदेश नीति और सर्जिकल स्ट्राइक का. मोदी ने कांग्रेस के सवालों का जवाब देने की बजाय कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा कर दिया. मोदी के इस अंदाज़ की काट पूरी कांग्रेस मिलकर भी चार साल में नहीं ढूंढ पाई.

जनता से दूर इसलिए हारने के लिए मजबूर !

2014 की हार के बाद कांग्रेस को तीन साल में एक बात समझ में आई कि बीजेपी की सोशल मीडिया टीम बहुत मजबूत है. कांग्रेस ने अपना पूरा जोर सोशल मीडिया नेटवर्किंग पर लगाया. इसका असर भी हुआ लेकिन इस चक्कर में कांग्रेस के नेता ‘मेनस्ट्रीम मीडिया’ यानी अखबार और टेलीविजन पर सही मुद्दे उठाने से चूकते रहे. कांग्रेस की नियमित प्रेस ब्रीफिंग में उन मुद्दों का अकाल पड़ गया, जो जनता से सीधे जुड़े हुए थे. कर्नाटक चुनाव के दौरान भी कांग्रेस के प्रवक्ताओं की फौज हर उन मुद्दों की बात करते रहे, जिनका देश की आम जनता से कोई सीधा सरोकार नहीं था. 14 मई को कांग्रेस की डेली ब्रीफिंग में जम्मू में बीजेपी नेताओं द्वारा खरीदी गई जमीन को मुद्दा बनाया गया. 9 मई को कांग्रेस की प्रेस ब्रीफिंग में पवन खेड़ा ने राजीव चंद्रशेखर और अर्णब गोस्वामी के कारोबारी रिश्तों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की. 8 मई को कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के महाभियोग मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर मीडिया को ब्रीफ किया. 7 मई को आनंद शर्मा ने नियमित मीडिया ब्रीफिंग में कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी के भाषणों में तथ्यों की गलती पर बात की और सवाल उठाया कि पीएम समेत पूरी केंद्र सरकार कर्नाटक में क्यों है? 5 मई को पी एल पुनिया ने कहा कि देश में दलितों पर हमले हो रहे हैं और पीएम मोदी कर्नाटक में रैलियों की संख्या बढ़ाते जा रहे हैं.

हैरानी है. कांग्रेस के किसी दिग्गज नेता को जरूरी नहीं लगा कि पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों को मुद्दा बनाया जाए. किसी ने जरूरी नहीं समझा कि बेरोजगारी पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाए. किसी को ख्याल नहीं आया कि खराब मौसम से फसलों की बर्बादी का मुद्दा उठाकर सरकार से पूछा जाए कि किसानों को फौरन राहत देने के लिए सरकार के पास कुछ है क्या? कांग्रेस के किसी धुरंधर को होश नहीं रहा कि देश में महंगाई का हाल क्या है? मोदी सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस को ललकारते रहे और कांग्रेस के किसी प्रवक्ता ने नहीं पूछा कि पिछले चार साल में सीमा पर शहीदों की संख्या क्यों बढ़ गई, कहां है पाकिस्तान को चार टुकड़े कर देने की पुरानी हुंकार?

रस्सी जल गई, बल नहीं गया !

कर्नाटक के नतीजों की ओर लौटते हैं. कर्नाटक से पहले जितने राज्यों में चुनाव हुए, उनमें कांग्रेस की हालत बहुत अच्छी नहीं थी. पंजाब को छोड़कर कांग्रेस को कहीं जीत नसीब नहीं हुई और पंजाब में भी कांग्रेस इसलिए जीती, क्योंकि वहां 10 साल में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर मजबूत थी. कर्नाटक में सिद्धारमैया के करिश्मे पर कांग्रेस ने कुछ ज्यादा ही भरोसा कर लिया. भरोसा करते समय ये नहीं सोचा कि कर्नाटक में मुकाबला मोदी से होगा, येदियुरप्पा तो सिर्फ मुखौटा हैं. सोचकर हंसी आती है कि एक तरफ कांग्रेस 2019 के लिए महागठबंधन की बात कर रही थी और दूसरी ओर कर्नाटक में उसने एचडी देवगौड़ा के जनता दल सेक्युलर को ‘अंडर एस्टीमेट’ किया. कांग्रेस इस ऐंठन में थी कि जेडीएस कर्नाटक में तीसरे नंबर की पार्टी है. अगर कांग्रेस ने अहंकार त्याग कर जेडीएस को गठबंधन के लिए राजी किया होता तो कर्नाटक का नतीजा 2015 के बिहार चुनाव जैसा होता और 2019 के लिए सभी गैर बीजेपी दलों को बीजेपी को हराने का रास्ता दिख जाता. मुख्य विपक्षी पार्टी होने के नाते ये कांग्रेस का फर्ज था कि वो बाकी विपक्षी दलों की एका की पहल करती, लेकिन अकेले सत्ता सुख भोगने के लोभ और राष्ट्रीय पार्टी होने के अहंकार ने कांग्रेस की लुटिया डुबो दी.

अब कांग्रेस की खुली मुट्ठी, खाली हाथ!

कर्नाटक हारने के बाद अब कांग्रेस की मुट्ठी पूरी तरह खुल गई है. कांग्रेस पूरी तरह से खाली हाथ है. गुजरात चुनाव में ठीक-ठाक प्रदर्शन से कांग्रेस के लिए जो माहौल बना था, वो कर्नाटक की हार से खत्म हो गया है. अब कांग्रेस 2019 के महागठबंधन में किसी भी राज्य में सौदेबाजी की हालत में नहीं दिख रही है. बिहार में वो आरजेडी की जूनियर पार्टनर पहले से है. बंगाल में ममता बनर्जी उसे पहले ही औकात बता चुकी हैं. तमिलनाडु में डीएमके कहां जाएगी, पता नहीं. महाराष्ट्र में एनसीपी उसे घुटने के बल बैठाकर ही समझौता करेगी, इसका अंदाज़ा लोकसभा उपचुनाव से ही हो रहा है. यूपी में सपा-बसपा गठबंधन को रत्ती भर परवाह नहीं है कि कांग्रेस उनके साथ आएगी या नहीं. अब मजबूरी कांग्रेस के सामने है. वो या तो दिसंबर तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव से साबित करे कि वो गलती सुधार कर खुद को मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित कर सकती है, बीजेपी को हरा सकती है. या फिर वो क्षेत्रीय दलों की बैसाखी थामने के लिए तैयार रहे.

कर्नाटक में बीजेपी की जीत पर NDA की पार्टियों ने कहा- 2019 में भी चलेगा मोदी का करिश्मा

Karnataka Elections Results 2018: कांग्रेस को बीजेपी से ज्यादा वोट लेकिन सीटों का अकाल- ऐसा कैसे हो गया ?

देश और दुनिया की ताजातरीन खबरों के लिए हमे फॉलो करें फेसबुक,गूगल प्लस, ट्विटर पर और डाउनलोड करें Inkhabar Android Hindi News App