नई दिल्ली: सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में महंगाई दर गिरकर 1.54 फीसदी पर पहुंच गई है. इसको यूं समझिए कि आंकड़ों में महंगाई उतनी है जितनी 1978 में थी लेकिन क्या बाजार में महंगाई की दर उतनी ही है जितनी 1978 के दौर में रही होगी. 
 
धनिया 150 रुपया किलो, टमाटर 60 रुपय किलो, करेला 40 रुपय किलो, भिंडी 70 रुपय किलो. ये सब्जी का हाल है. रिटेल में ये सब्जियां आपकी किचन तक पहुंचने-पहुंचते 30-40 फीसदी और महंगी हो जाती है लेकिन सरकार कह रही है कि महंगाई दर 2 फीसदी से भी नीचे चली गई है. मतलब महंगाई अपने निचले स्तर पर है. सवाल ये है कि क्या महंगाई के आंकड़ों में कोई गड़बड़झाला है ? 
 
 
सरकारी दावा या आंकड़ों की जादूगरी कहें तो महंगाई दर उस स्तर पर है जिस स्तर पर 1978 में थी. ग्रोसरी के सामान मतलब चावल, दाल, आटा और बाकी चीजें और इसके साथ में हरी सब्जियों का रिएलिटी चेक किया है. दिल्ली में खरीदारी करने वाले ज्यादातर लोग ये मानते हैं कि महंगाई कम हुई है. लेकिन ये चावल, दाल और सरसो तेल तक सीमित है.
 
वैसे आटा की कीमतें 20 फीसदी तक बढ़ी हैं लेकिन सब्जियों के क्या हाल हैं क्योंकि उसकी जरूरत तो रोजाना होती है. लोगों ने बताया सब्जियों की कीमतें आसमान छू रही हैं. अगर महंगाई दर 1978 के स्तर पर गिरी हुई है तो फिर मंडियों में ये हाल क्यों है. 
 
 
मतलब खरीददार ये मान रहे हैं कि किराना के लूज आइटम जैसे चावल, दाल, बेसन, मसाला इन सबके दाम कंट्रोल में हैं. लेकिन सवाल फिर भी है कि कितने कंट्रोल में हैं. क्या सचमुच पिछले तीन सालों से कीमतें स्थिर हैं. मतलब बढ़ी नहीं है.
 
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