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युवाओं की बात सुनना…’संसद चलो’ मार्च पर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

Supreme Court: दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध में हो रहे प्रदर्शन के दौरान 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान हिंसा भड़क गई थी. जिसको लेकर मार्च के आयोजकों के खिलाफ याचिका दायर की गई है.

By: Sohail Rahman | Published: August 5, 2026 4:23:34 PM IST



Supreme Court on Parliament March: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा रोकने के लिए समाज और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के पास सबसे बड़ी ताकत युवाओं की बात सुनना और उन्हें समझाना है. कोर्ट ने चेतावनी दी कि ताकतवर सरकार के नाम पर कोई भी आक्रामक कार्रवाई स्थिति को और खराब कर सकती है, जिसकी वजह से ज्यादा अशांति पैदा हो सकती है.

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने ये बातें तब कहीं जब वे राष्ट्रीय राजधानी में 20 जुलाई को हुए ‘संसद चलो’ मार्च के आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हुए.

संसद मार्च के दौरान हुई थी हिंसा

इस मार्च के दौरान हिंसा हुई थी. कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस याचिका को उन याचिकाओं के साथ जोड़ा जाए जो पहले से ही छात्रों के विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादतियों से संबंधित मामलों में कोर्ट के सामने लंबित हैं. यह नई याचिका भारतीय वायु सेना के पूर्व अधिकारी मनीष सोलंकी ने दायर की है. उन्होंने 20 जुलाई के मार्च में शामिल आयोजकों और कथित दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई और जवाबदेही की मांग की है.

याचिकाकर्ता ने क्या आग्रह किया?

याचिका में कोर्ट से यह भी आग्रह किया गया है कि वह केंद्र सरकार और राज्यों को हालिया छात्र विरोध प्रदर्शनों से जुड़े दंगे के मामलों को केवल किसी राजनीतिक समझौते के आधार पर वापस लेने से रोके. साथ ही इसमें उन लोगों की पहचान करने और उनसे सामुदायिक सेवा करवाने के निर्देश देने की भी मांग की गई है जिन्होंने पुलिस या सुरक्षा कर्मियों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी. सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रिजवान अहमद ने तर्क दिया कि जहां सरकारों और पुलिस की जवाबदेही पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं विरोध प्रदर्शन के आयोजक जांच-पड़ताल से बच निकले हैं.

सुप्रीम कोर्ट के बेंच ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि बेहतर तरीका है कि उन्हें समझाया जाए. सबसे असरदार तरीका है उनकी बात सुनना. उनकी बात सुनें और समझें कि वे वहां क्यों हैं. इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि वह अपने सामने उठाए गए बड़े कानूनी मुद्दों की जांच करते हुए ऑपरेशन से जुड़े फैसले कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर छोड़ देगी. बेंच ने कहा कि इसे कानून लागू करने वाली एजेंसियों की समझ पर छोड़ देते हैं. वे बेहतर जानते हैं कि जमीनी स्तर पर हालात कैसे संभालने हैं. हम सभी पक्षों और सभी तरह की राय सुनने के लिए तैयार हैं. सरकार को भी इस पर जवाब देने दें.

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