Supreme Court Decisions: सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के बाद बेटियों के अधिकारों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि शादी के बाद भी बेटियां अपने परिवार का अभिन्न अंग होती हैं. किसी बेटी को केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति के लिए अयोग्य माना जा सकता. सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण फैसले ने शादीशुदा बेटियों के अधिकारों को लेकर फैली भ्रांति को दूर कर दिया है.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस दलील का खारिज कर दिया कि निवास स्थान एक अळग पात्रता मानदंड है, जिसका मूल्यांकन हम मामले के विशिष्ट तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने टिप्पणी की कि सभी शादीशुदा बेटियों को उनके अधिकारों से वंचित करना इस धारणा के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता कि हर शादीशुदा बेटी अनिवार्य रूप से कहीं और ही रहती है. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि संवैधानिक फैसले ऐसी धारणाओं पर आधारित नहीं हो सकते जो व्यापक प्रकृति की हों और वास्तविक जीवन की सच्चाइयों से कटी हुई हों.
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याचिकाकर्ता ने कोर्ट के समक्ष दिया तर्क
याचिकाकर्ता निशा ने कोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया कि शादीशुदा बेटियों को किसी कल्याणकारी योजना से बाहर रखने का कोई तार्किक आधार नहीं है और ऐसा करना समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है. तो वहीं दूसरी तरफ सरकार ने यह तर्क दिया कि शादीशुदा बेटियां आमतौर पर अपने ससुराल चली जाती हैं. इसके अलावा, सरकार ने आगे यह दलील दी कि शादी के बाद बेटियां स्थानीय निवास की शर्त को पूरा करने में असमर्थ हो सकती हैं.
सरकार ने क्या दलील दी?
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य उत्तराधिकार का अधिकार पैदा करना नहीं है, बल्कि मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक राहत प्रदान करना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में निरंतरता सुनिश्चित करना है. एक बार जब ‘निर्भरता’ को ही मुख्य मानदंड के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो किसी शादीशुदा बेटी को केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर बाहर रखना अतार्किक हो जाता है.
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