Samay Raina | Kashmiri Pandit History: समय रैना वो नाम है जो चंद महीनों में देशभर के युवाओं की जुबानों पर है. स्टैंड-अप कॉमेडियन और यूट्यूबर समय रैना ने एक बार फिर india’s got latent से वापसी कर ली है.पहले सीजन के बाद जिन मुश्किलों से समय रैना गुजरे और कश्मीर में हुए पंडितों पर अत्याचार को लेकर उन्होंने खुल कर बात की. इस दौरान उन्होंने साफ कहा था कि कश्मीर के लोग अक्सर दो गुटों की लड़ाई में मारे जाते हैं. उन्होंने कश्मीर में हुए नरसंहार और पंडितों के पलायन के दौर के बारे में भी भावुक होकर बात की. समय ने इस दौरान बताया था कि कैसे उनके घर पर गोलियों की बरसात हुई थी और बाद में उसे आग को सौंप दिया गया था. इतना ही नहीं उन्होंने ये भी बताया था कि उस दौरान पंडित आबादी में सिर्फ 5 प्रतिशत थे; अगर वो अपने लिए आवाज उठाते लड़ते तो बुरी तरह मारे जाते.
घाटी का दर्द
समय रैना का दर्द सुन कर कश्मीरी नरसंहार और हिंदू आबादी के पलायन का मुद्दा एक बार फिर उठा और कश्मीरी पंडितों को उनके दर्द भरे दिन भी याद आए. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि उस दौर में हिंदुओं पर बरपाए गए कहर ने घाटी के शानदार इतिहास को बर्बाद कर दिया था. चलिए जान लेते हैं कि 1990 के दशक में आखिर ऐसा क्या हुआ जिसने पंडितों को इस हद तक दर्द दिया कि उन्हें अपना पहाड़ों के बीच खूबसूरत आशियाने को छोड़कर भारत के दूसरे हिस्सों में जाकर बसना पड़ा.
पंडितों पर हुआ खूब जुल्म
बता दें कि कश्मीरी पंडित सिर्फ़ एक समुदाय नहीं हैं बल्कि वो कश्मीर की ‘कश्मीरियत’ और उसकी हज़ारों साल पुरानी सभ्यता के वाहक रहे हैं. कभी कश्मीर की धरती पर सूर्य की पूजा होती थी; राजा ललितादित्य के शासनकाल में मार्तंड सूर्य मंदिर बनवाया गया था. लेकिन, 1990 के दशक में धार्मिक कट्टरपंथ और आतंकवाद ने इस खूबसूरत माहौल को बर्बाद कर दिया और सैकड़ों पंडितों की जान ले ली. लोगों को अपने घर छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा. फिर भी, समय रैना के शब्दों में कहें तो, उन्होंने अब दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई है और हर क्षेत्र में बेहतरीन काम कर रहे हैं.
लंबे समय तक कायम रखी संस्कृति
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी का मूल निवासी माना जाता है इतना ही नहीं वो सारस्वत ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. सांस्कृतिक योगदान की बात करें तो, मध्यकाल तक कश्मीर हिंदू और बौद्ध शिक्षा का वैश्विक केंद्र रहा है. आचार्य अभिनवगुप्त से लेकर राजतरंगिणी के लेखक कल्हण तक, कई विद्वानों ने इसी जगह से भारतीय दर्शन को एक नई दिशा दी. इसके बाद धार्मिक बदलाव का दौर आया. 14वीं सदी के बाद, सुल्तान सिकंदर ‘बुत्शिकन’ (मूर्ति-भंजक) के शासनकाल में घाटी में बड़े पैमाने पर धर्म-परिवर्तन हुए. इसके बावजूद, कश्मीरी पंडितों ने अपनी पहचान बनाए रखी और सदियों तक मुस्लिम-बहुल समाज के साथ मिलकर ‘कश्मीरियत’ की भावना यानी मिल-जुलकर रहने की संस्कृति को जीवित रखा.
समय रैना के परिवार पर टूटा था दुखों का पहाड़
‘दोस्तकास्ट’ पॉडकास्ट पर बात करते हुए, समय रैना ने एक कॉमेडियन के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर बात की जो सदमे, अनिश्चितता और मुश्किल हालात में ज़िंदा रहने की जद्दोजहद से बने अपने परिवार के इतिहास को याद कर रहा था. उन्होंने बताया कि अशांति के दौरान उनके दादाजी को, जो उनके कश्मीरी गाँव में एक जाने-माने डॉक्टर थे, सीधे तौर पर निशाना बनाया गया था. “मेरे दादाजी को मारने वालों की लिस्ट में शामिल किया गया था क्योंकि वो गाँव के बहुत मशहूर डॉक्टर थे. उस समय, चिट्ठियाँ बाँटी जाती थीं जिनमें लिखा होता था कि अगले दिन किसे मारा जाएगा.” उन्होंने याद किया कि घर में सभी के लिए यह कितना मुश्किल और तनावपूर्ण था “जब वो चिट्ठी आई जिसमें लिखा था कि मेरे दादाजी को मार दिया जाएगा, तो मेरी माँ बेहोश हो गईं. मेरी दादी भी बेहोश हो गईं. मेरी बुआ हिम्मत वाली थीं वो चुपचाप उस क्लिनिक में गईं जहाँ मेरे दादाजी काम करते थे,”
कश्मीरी मुसलमानों ने की थी मदद
उन्होंने कहा. हालाँकि, उन्हें जो बात सबसे ज़्यादा याद है, वो सिर्फ़ डर नहीं, बल्कि उनके परिवार को मिली वो मदद है जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं थी. समय रैना ने बताया कि उनके दादाजी का स्थानीय समुदाय में बहुत सम्मान था और उसी जुड़ाव ने अंततः उनकी जान बचाई. “रैना ने बताया कि अच्छी बात यह थी कि गाँव में उनके दादाजी की बहुत अच्छी साख थी और वहाँ के कश्मीरी मुसलमानों ने परिवार को वहाँ से निकलने में मदद की. उन्होंने बताया, ‘उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ नहीं होगा क्योंकि उन्होंने लोगों के लिए बहुत कुछ किया था.’ उन्होंने साफ़ तौर पर कहा, ‘कश्मीरी मुसलमानों ने ही मेरे दादाजी को उस स्थिति से बाहर निकलने में मदद की थी’.”