Kalita Manjhi Story: जिन हाथों में दूसरों के घरों के जूठे बर्तन और साफ़ सफाई की थी वो आज बंगाल के ऑसग्राम के लोगों ने उन्हीं हाथों में अपनी किस्मत की चाबी सौंप दी है. कलिता माझी जिन्होंने सिर्फ़ 2,500 की मामूली मासिक तनख्वाह के लिए चार घरों में लगातार कड़ी मेहनत की उन्होंने गरीबी की बेड़ियों को तोड़कर पश्चिम बंगाल विधानसभा तक का एक शानदार सफर तय किया है. कलिता माझी अब लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में बैठकर उन दस्तावेजों पर दस्तखत करेंगी जो उनके निर्वाचन क्षेत्र का भविष्य तय करेंगे. सोमवार, 4 मई को जब चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो 12,535 वोटों की जीत के अंतर ने यह पक्के तौर पर साबित कर दिया कि सत्ता अब सिर्फ़ महलों की बपौती नहीं रही बल्कि यह एक साधारण घरेलू कामगार का भी उतना ही हक है जो एक झोपड़ी की साधारण चारदीवारी से निकलकर सामने आई है.
विधानसभा तक का सफ़र
ऑसग्राम (आरक्षित) निर्वाचन क्षेत्र से BJP उम्मीदवार कलिता माझी की जीत इस चुनावी दौर की सबसे प्रेरणादायक कहानियों में से एक बनकर उभरी है. कलिता, जिन्होंने दशकों तक दूसरों के घरों में बर्तन मांजने और फर्श साफ करने में बिताए अब विधानसभा के भीतर जनसेवा की बागडोर संभालेंगी. 2006 में सुब्रत माझी जो एक दिहाड़ी मजदूर हैं उनसे शादी के बाद उन्होंने अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए चार घरों में घरेलू सहायिका के तौर पर काम करना शुरू किया. अपने बेटे पार्थ की पढ़ाई का खर्च उठाने और अपने परिवार की रोज़मर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए, कलिता सुबह 5:00 बजे ही काम पर निकल पड़ती थीं.
2021 के चुनावों में हार
कलिता की राजनीतिक यात्रा 2021 में शुरू हुई, जब BJP ने उन्हें पहली बार उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा. उस समय वह लगभग 11,000 वोटों के अंतर से चुनाव हार गई थीं. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों के बीच लगातार सक्रिय रहीं.
कलिता माझी ने कहा, ‘मैं यह साबित करना चाहती हूँ कि एक घरेलू कामगार भी विधानसभा सदस्य (MLA) बन सकती है. मैं गरीबों के लिए आवाज़ उठाऊँगी. उन लोगों के लिए जो सच में समझते हैं कि लगभग न के बराबर संसाधनों के साथ गुज़ारा करने का क्या मतलब होता है.’
उन्होंने ऑसग्राम में स्वास्थ्य और शिक्षा की खस्ता हालत को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता के तौर पर पहचाना है. उनके अनुसार इस इलाके के गरीब लोगों को इलाज के लिए ज़िला अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ता है जबकि स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है ये ऐसी समस्याएँ हैं जिन्हें वे तुरंत हल करना चाहती हैं.