राजधानी के प्रतिष्ठित इम्पीरियल होटल में सोमवार को आयोजित ‘वी विमेन वांट कॉनक्लेव 2026 (We Women Want Conclave 2026) और शक्ति अवॉर्ड्स’ के मंच पर जब अमृता फडणवीस पहुंचीं, तो उनका अंदाज किसी औपचारिक भाषण जैसा नहीं, बल्कि दिल से निकली एक आत्मीय बात जैसा लगा. कार्तिकेय शर्मा, ऐश्वर्या पंडित शर्मा, शक्ति रानी शर्मा, मशहूर फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर और देश की नामचीन हस्तियों की मौजूदगी में उन्होंने महिलाओं के नेतृत्व और उनके सपनों पर एक बेहद गहराई से भरी बात रखी.
अमृता जी ने हंसते हुए शुरुआत में कहा कि यह देश का सबसे सुरक्षित मंच लग रहा है. अगर सेहत की बात हो तो डॉक्टर मौजूद हैं, कानूनी उलझन हो तो वकील, रेसिपी चाहिए तो शेफ और देश की बात समझनी हो तो सांसद! लेकिन इस खुशनुमा माहौल के बीच उन्होंने जो सबसे अहम सवाल उठाया, वो हर किसी को सोचने पर मजबूर कर गया, ‘सवाल यह नहीं है कि महिलाएं क्या चाहती हैं, सवाल तो यह है कि अगर महिलाओं को वो करने दिया जाए जो वे चाहती हैं, तो भारत की तस्वीर कैसी होगी?’
डाइनिंग टेबल के बोर्डरूम से यूनिकॉर्न तक का सफर
अमृता फडणवीस ने भारतीय महिलाओं की inherent (जन्मजात) लीडरशिप को रेखांकित करते हुए कहा कि महिलाएं हमेशा से अपने घरों की ‘सीईओ’ रही हैं.
‘फर्क सिर्फ इतना है कि पहले हमारे बोर्डरूम डाइनिंग टेबल हुआ करते थे, बजट रसोई में तय होते थे और एचआर मैनेजमेंट का मतलब बच्चों को गैजेट्स से दूर रखकर बेहतर खाना खाने के लिए मनाना होता था. आज वही महिला अपने उसी कौशल के बल पर दुनिया के बड़े से बड़े मंच पर अपनी कामयाबी का परचम लहरा रही है.’
उन्होंने फाल्गुनी नायर (नायका), किरण मजूमदार-शॉ (बायोकॉन), उपासना टाकू (मोबीक्विक), गज़ल अलघ (मामाअर्थ) और रोशनी नादर मल्होत्रा (एचसीएल टेक) जैसी देश की शीर्ष महिला उद्यमियों का उदाहरण देते हुए कहा कि इन महिलाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था में एक बड़ा बदलाव लाया है—इन्होंने महिलाओं को सिर्फ ‘उपभोक्ता’ (Consumers) से ‘स्रष्टा’ (Creators) बना दिया है.
छोटे शहरों और गांवों से उठती बदलाव की बयार
बात सिर्फ बड़े महानगरों या अरबों डॉलर के कॉरपोरेट हाउस तक सीमित नहीं है. अमृता जी ने बताया कि भारत में आज दर्जनों यूनिकॉर्न और लाखों स्टार्टअप्स में से करीब आधे टियर-2 और टियर-3 शहरों से निकल रहे हैं, और इनमें से हर दूसरे स्टार्टअप में कोई न कोई महिला लीडर या प्रमोटर है.
लेकिन असली सामाजिक क्रांति का जिक्र करते हुए उन्होंने ग्रामीण भारत का रुख किया. उन्होंने कहा कि असली ‘बिजनेस स्कूल’ कई बार जिंदगी के कड़वे अनुभव होते हैं. गांवों की महिलाओं ने पानी की किल्लत, खराब सड़कें और बुनियादी सुविधाओं का अभाव खुद झेला है. इसीलिए जब वही महिलाएं सरपंच या पंचायत नेता बनती हैं, तो वे सिर्फ फैसले नहीं लेतीं, गांव की तकदीर बदल देती हैं.
राजस्थान की पूर्व सरपंच छवि राजावत द्वारा पानी के संरक्षण के लिए किए गए जमीनी काम और महाराष्ट्र के ढाबा तालुका की पहली महिला सरपंच योगेश्वरी चौधरी का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे 1.16 लाख से ज्यादा पेड़ लगाकर और क्लाइमेट एक्शन अवॉर्ड जीतकर योगेश्वरी जी ने पूरे गांव का कायाकल्प कर दिया.
एक-दूसरे का हाथ थामने का वक्त
अमृता फडणवीस ने कहा कि चाहे कोई महिला 50,000 करोड़ का साम्राज्य चला रही हो या गांव में एक छोटा सा उद्यम, उनके भीतर की ‘एंटरप्रेन्योरशिप’ एक जैसी ही होती है, समस्या को पहचानना और सीमित संसाधनों में उसका सबसे बेहतर समाधान ढूंढना.
कार्यक्रम के अंत में उन्होंने समाज के हर वर्ग से महिलाओं का खुलकर साथ देने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकार की अपनी योजनाएं हैं, लेकिन समाज के तौर पर हमें भी एक-दूसरे की ढाल बनना होगा.
एक संवेदनशील संदेश के साथ उन्होंने अपनी बात पूरी की, ‘आज वक्त है कि हम सब एक-दूसरे का हाथ थामें, चाहे वो ब्रेस्ट कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना हो या किसी महिला के छोटे से सपने को पंख देना.’