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Pregnancy Tips: गर्भावस्था में डायबिटीज का पता कब चलता है? किन महिलाओं में खतरा अधिक, जानें संकेत और बचाव टिप्स

Pregnancy Diabetes: प्रेग्नेंसी हर महिला के लिए बेहद सुखद एहसास होता है. इधर मां बच्चे की सलामती के लिए दिन रात कामना करती है, तो वहीं परिवार के लोग भी नन्हें मेहमान का इंतजार कर रहे होते हैं. लेकिन, आपको बता दें कि गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. इसी वजह से कुछ महिलाओं में पहली बार ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या सामने आती है, जिसे जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है.

By: Lalit Kumar | Published: August 29, 2026 4:20:51 PM IST



Pregnancy Diabetes: प्रेग्नेंसी हर महिला के लिए बेहद सुखद एहसास होता है. इधर मां बच्चे की सलामती के लिए दिन रात कामना करती है, तो वहीं परिवार के लोग भी नन्हें मेहमान का इंतजार कर रहे होते हैं. लेकिन, आपको बता दें कि गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं. इसी वजह से कुछ महिलाओं में पहली बार ब्लड शुगर बढ़ने की समस्या सामने आती है, जिसे जेस्टेशनल डायबिटीज कहा जाता है. खास बात यह है कि कई बार इसके स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और महिला को इसका पता रुटीन जांच के दौरान ही चलता है. ऐसे में सवाल है कि गर्भावस्था में डायबिटीज का पता कितने दिन या कितने हफ्ते में चलता है और इससे मां-बच्चे को क्या खतरा हो सकता है? आइए जानते हैं डॉक्टर की सलाह के मुताबिक जरूरी बातें.

24 से 26 हफ्ते में होती है अहम जांच

डॉ. मीरा पाठक के मुताबिक, जेस्टेशनल डायबिटीज आमतौर पर गर्भावस्था के 24 से 26 हफ्ते, यानी छठे-सातवें महीने के आसपास सामने आती है. इसकी मुख्य वजह प्लेसेंटा से निकलने वाले कुछ हार्मोन होते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील बना सकते हैं. इससे ब्लड शुगर बढ़ने लगता है. हालांकि, हर महिला को इस समय तक इंतजार नहीं करना चाहिए. पहली बार एंटीनेटल चेकअप के दौरान डॉक्टर की सलाह से ब्लड शुगर की जांच कराना जरूरी है. खासकर हाई रिस्क वाली महिलाओं में शुरुआत से ही निगरानी की जरूरत होती है.

किन महिलाओं को ज्यादा खतरा?

जिन महिलाओं का वजन ज्यादा है, उम्र 35 साल से अधिक है, परिवार में डायबिटीज की हिस्ट्री है, प्रेग्नेंसी में हाई ब्लड प्रेशर रहता है या पिछली गर्भावस्था में जेस्टेशनल डायबिटीज हो चुकी है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. इसके अलावा पहले गर्भ में मिसकैरेज, बच्चे की गर्भ में मृत्यु या चार किलो से अधिक वजन वाले बच्चे का जन्म भी जोखिम बढ़ाने वाले कारण हो सकते हैं. ऐसी महिलाओं के लिए 24-26 हफ्ते के बीच ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट (OGTT) महत्वपूर्ण हो सकता है.

लापरवाही से मां और बच्चे दोनों पर असर

ब्लड शुगर लगातार बढ़ा रहने पर मां को बार-बार इंफेक्शन, ज्यादा एम्नियोटिक फ्लूड और समय से पहले डिलीवरी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है. वहीं बच्चे का वजन जरूरत से ज्यादा बढ़ सकता है. जन्म के बाद ऐसे बच्चों में लो ब्लड शुगर और पीलिया का खतरा भी बढ़ सकता है.

डाइट में छिपी शुगर से सावधानी जरूरी

जेस्टेशनल डायबिटीज से बचाव के लिए संतुलित डाइट और एक्टिव रहना जरूरी है. सब्जियां, सलाद, दाल, दही, पनीर और अंडे जैसे पोषक खाद्य पदार्थ डाइट में शामिल किए जा सकते हैं. पैकेज्ड फ्रूट जूस, फ्लेवर्ड दूध-दही, बिस्किट, रस्क, केक, मफिन और मीठे पैकेज्ड ड्रिंक्स जैसी चीजों में मौजूद हिडन शुगर से दूरी बनाना बेहतर है.

‘दो लोगों का खाना’ जरूरी नहीं

गर्भावस्था में यह मानना कि अब दो लोगों जितना खाना जरूरी है, सही नहीं है. जरूरत के मुताबिक पोषण लेना ज्यादा महत्वपूर्ण है. डॉक्टर की सलाह से हल्की वॉक या प्रेग्नेंसी योग किया जा सकता है. हर भोजन के बाद 10-15 मिनट टहलना भी मददगार हो सकता है.

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