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IVF तकनीक से बनना चाहती हैं मां? कंसीव करने से पहले जान लें ये 5 जरूरी बातें, सभी भ्रम हो जाएंगे दूर

IVF pregnancy Tips: जो कपल नेचुरल प्रेग्नेंसी कंसीव नहीं कर पाते हैं, वे आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) की मदद लेते हैं. आईवीएफ तकनीक के जरिए माता-पिता बनने का सुख भोग सकते हैं, लेकिन इस तकनीक का इस्तेमाल करते समय कुछ बातों की सावधानी रखनी होती है. अगर आप भी आईवीएफ की मदद से माता-पिता बनना चाहते हैं, तो डॉक्टर की बताई कुछ बातों को जान लेना चाहिए-

By: Lalit Kumar | Published: June 13, 2026 7:12:17 PM IST



IVF pregnancy Tips: शादी के बाद हर कपल अपनी प्रेग्नेंसी प्लान करता है. लेकिन, कुछ शारीरिक समस्याओं (Reproductive Physical Problems) की वजह से महिलाएं नेचुरल कंसीव नहीं कर पाती हैं. ऐसे में महिलाएं चिंतित रहने लगती हैं. ये कपल पहले तो प्रेग्नेंसी कंसीव करने के लिए हर कोशिश आजमाते हैं, जब सफलता नहीं मिलती है तो आईवीएफ तकनीक (IVF Technology) की मदद लेते हैं. जी हां, आईवीएफ तकनीक के जरिए माता-पिता बनने का सुख भोग सकते हैं, लेकिन इस तकनीक का इस्तेमाल करते समय भी कुछ बातों की सावधानी रखनी होती है. अगर आप भी आईवीएफ की मदद से माता-पिता बनना चाहते हैं, तो डॉक्टर की बताई कुछ बातों को जरूर जान लेना चाहिए-

आईवीएफ तकनीक लेने से पहले किन बातों का रखें ध्यान

प्रॉपर मेडिकल चेकअप: नोएडा की सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मीरा पाठक कहती हैं कि, आईवीएफ तकनीक को अपनाने से पहले पूरी तरह से संतुष्ट हो जाना चाहिए कि प्रजनन की समस्या क्या है. गर्भ नहीं ठहर पाने के पीछे कई शारीरिक कारण हो सकते हैं, जैसे हार्मोन से जुड़ी समस्या, ट्यूब में संक्रमण या शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थता आदि. इन सभी को उचित मेडिकल चेकअप करवा लेना चाहिए. इसके बाद ही आईवीएफ तकनीक को अपनाना चाहिए.

मेल फर्टिलिटी टेस्ट भी कराएं: आईवीएफ तकनीक अपनाने से पहले मेल फर्टिलिटी टेस्ट भी करवा लेना चाहिए. इसके जरिए पुरुषों में संतानोत्पत्ति की क्षमता की जांच की जाती है. मेल फर्टिलिटी टेस्ट से पुरुषों में शुक्राणु की जांच की जाती है. अगर पुरुष की जांच ठीक आ जाए, उसके बाद ही आईवीएफ तकनीक अपनानी चाहिए.

पीएमओएस की जांच: आईवीएफ तकनीक को अपनाना तब सही होता है, जब महिला के ट्यूब में ब्लॉकेज हो. कुछ मामलों में पीसीओएस (अब PMOS) की स्थिति में भी आईवीएफ का विकल्प अपनाया जाता है. दरअसल, पीएमओएस महिलाओं के शरीर में  हार्मोन के असंतुलन और अंडा निषेचित नहीं होने की स्थिति कहलाती है. महिलाओं में पीएमओएस की शारीरिक समस्या को आईयूआई और आईवीएफ तकनीक से ठीक किया जा सकता है.

3 तरह की होती आईवीएफ तकनीक की प्रक्रिया

डॉ. मीरा पाठक कहती हैं कि, आईवीएफ तकनीक की प्रक्रिया तीन तरह की होती है- नेचुरल, मिनिमल और कनवेंशनल. 

नेचुरल: नेचुरल आईवीएफ कुदरती अंडे के जरिए किया जाता है, न कि स्टिमुलेशन के जरिए तैयार किए गए महिला के अंडाणु से. यह प्रक्रिया उन महिलाओं के लिए सही होती है, जो बहुत ज्यादा इलाज या दवा आदि के खर्च से बचना चाहती हैं. 

मिनिमल स्टिमुलेशन: मिनिमल स्टिमुलेशन आईवीएफ में दवा के जरिए स्वस्थ अंडाणु तैयार किए जाते हैं. इस तकनीक में खर्च थोड़ा बढ़ जाता है. इस खर्चे की वजह से कई लोग यह तकनीक लेने से वंचित रह जाते हैं.

कनवेंशनल: तीसरी तरह की आईवीएफ तकनीक पारंपरिक तरीके से की जाती है, जिसे कनवेंशनल आईवीएफ कहा जाता है, जिसमें अंडाणु और वीर्य को विशेष माहौल में मिलाया जाता है, जिसमें निषेचन की संभावना काफी ज्यादा होती है और प्रजनन की संभावना काफी बढ़ जाती है.

अंडाणु बनने के बाद स्पर्म किया जाता इंजेक्ट

जब महिला का अंडाणु तैयार हो जाता है तब इसमें स्पर्म इंजेक्ट किया जाता है. आईसीएसआई तकनीक के जरिए वीर्य के संपर्क में अंडाणु को लाया जाता है. इसी प्रक्रिया के जरिए भ्रूण तैयार होने लगता है. आईवीएफ तकनीक में भ्रूण की निगरानी की प्रक्रिया बेहद खास होती है. अंडा निकालने के 48 घंटे बाद कम से कम दो तीन सेल्स होने चाहिए. 72 घंटे या तीन दिन के बाद यह संख्या 7-10 होनी चाहिए. 

15 दिन के बाद प्रेग्नेंसी का लगाया जा सकता पता

पांचवें दिन भ्रूण ब्लास्टोसिस्ट स्टेज में पहुंच जाता है. इसे टेस्ट ट्यूब सेंटर में पूरी तरह से निगरानी में किया जाता है. अगर भ्रूण हस्तांतरित करने की प्रक्रिया सही तरह से हो जाती है तो गर्भधारण में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन का समय लगता है. 15 दिन के बाद प्रेग्नेंसी टेस्ट के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि आईवीएफ की प्रक्रिया सफल हुई है या नहीं.

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