Dopamine Increase: आजकल लोगों का ज्यादातर भागदौड़ में बीत रहा है. बीच में जैसे ही थोड़ा खाली समय मिलता है, वे तुरंत मोबाइल उठाकर Instagram या YouTube Shorts पर रील्स देखने लगते हैं. मतलब, कुछ सेकंड का ब्रेक भी अब स्क्रॉलिंग में बदल जाता है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है तुरंत मिलने वाला मनोरंजन और दिमाग में होने वाला डोपामाइन रिलीज. दरअसल, रील्स का फॉर्मेट ऐसा होता है कि हर कुछ सेकंड में नया और दिलचस्प कंटेंट सामने आ जाता है. कभी मजेदार वीडियो, कभी डांस तो कभी चौंकाने वाली क्लिप. यह लगातार बदलता कंटेंट दिमाग को बार-बार डोपामाइन रिलीज करने के लिए ट्रिगर करता है.
गौर करने वाली बात यह है कि, रील्स देखने से भले ही थोड़े समय के लिए खुशी मिले. लेकिन, इसकी आदत मेंटल हेल्थ को बिगाड़ सकती है. अब सवाल है कि, डोपामाइन क्या होता है? क्या सच में रील्स देखने से डोपामाइन बढ़ता है? इसकी आदत से दिमाग पर क्या असर पड़ता है? रील्स देखने की लिमिट जरूरी क्यों? इस बारे में बता रहे हैं राजकीय मेडिकल कॉलेज कन्नौज के मनोचिकित्सक डॉ. विवेक कुमार-
डोपामाइन क्या होता है?
हेल्थ एक्सपर्ट की मानें तो, डोपामाइन एक न्यूरोट्रांसमीटर (मस्तिष्क का रसायन) है, जो दिमाग में खुशी और संतुष्टि देता है. दरअसल, जब भी हम कोई अच्छा काम करते हैं- जैसे पसंदीदा खाना खाना, लक्ष्य हासिल करना या मनोरंजक चीजें देखना तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है और हमें अच्छा महसूस होता है. यह हमारे ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ का हिस्सा है, जो हमें बार-बार वही काम करने के लिए प्रेरित करता है. इसकी अधिकता या कमी दोनों ही समस्याएं पैदा कर सकती है, इसलिए संतुलन जरूरी है.
रील्स देखने से क्या सच में डोपामाइन बढ़ता है?
डॉक्टर के अनुसार, रील्स देखने पर दिमाग में डोपामाइन का अस्थायी रूप से बढ़ना एक नॉर्मल रिएक्शन है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब यह आदत लगातार और अनकंट्रोल हो जाती है. जब हम रील्स देखते हैं तो हर नया वीडियो एक छोटे रिवार्ड की तरह काम करता है. शॉर्ट वीडियो फॉर्मेट दिमाग को लगातार नए स्टिम्युलस देता है, जिससे डोपामाइन रिलीज ट्रिगर होता है. यह प्रक्रिया तुरंत खुशी देती है, लेकिन इसका असर बहुत कम समय के लिए होता है. इसी वजह से लोग लगातार स्क्रॉल करते रहते हैं ताकि उन्हें बार-बार वही फील-गुड अनुभव मिल सके.
आदत कैसे बन सकती घातक
डोपामाइन रिलीज होने की वजह से दिमाग एक पैटर्न सीख लेता है कि थोड़े समय के कंटेंट से भी खुशी मिल सकती है. फिर धीरे-धीरे व्यक्ति लंबी और फोकस करने वाली एक्टिविटीज में रुचि खोने लगता है और सिर्फ तेज, शॉर्ट और एंटरटेनिंग कंटेंट को देखना ज्यादा पसंद करता है. यही स्थिति डिजिटल एडिक्शन की शुरुआत मानी जाती है. यह वही स्थिति होती है, जिसमें व्यक्ति बिना सोचे-समझे घंटों तक रील्स देखता रहता है. यह एक तरह का ऑटोमैटिक बिहेवियर बन जाता है. इसका सबसे बड़ा असर यह है कि, व्यक्ति का ध्यान छोटी-छोटी चीजों में बंटने लगता है. लंबी बातचीत, पढ़ाई या किसी काम पर फोकस करना मुश्किल हो जाता है.
रील्स देखने की आदत पर डॉक्टर की सलाह
डॉक्टर कहते हैं कि, रील्स देखना पूरी तरह गलत नहीं है, लेकिन इसका बैलेंस जरूरी है. सीमित समय के लिए एंटरटेनमेंट के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है, लेकिन लगातार और बिना कंट्रोल के स्क्रॉलिंग मानसिक थकान और निर्भरता बढ़ा सकती है. रील्स देखने वालों को सलाह है कि, दिन में सीमित समय के लिए मोबाइल में रील्स और वीडियोज देखें. इसके अलावा, बीच-बीच में डिजिटल डिटॉक्स जरूर करें.