नई दिल्ली. इंटरनेट के युग में जन्मी आधुनिक पीढ़ी (जिन्हें मिलेनियल्स कहा जाता है) अपने सपनों को साकार करने, जिंदगी के पूरे मजे लूटने और खूब काम करने में यकीन रखती है. लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. नई पीढ़ी के इस सुंदर संसार में कुछ समस्याएं भी हैं.

ब्लू क्रॉस ब्लू शील्ड एसोसिएशन (बीसीबीएस एसोसिएशन) के ताजा अध्ययन के मुताबिक स्वास्थ्य और बेहतर जीवन के लिए ज्यादा निवेश करने के बावजूद नई पीढ़ी के लोग जनरेशन एक्स (60 से 80 के दशक के दरमियान जन्मे) की तुलना में बढती उम्र के साथ स्वास्थ्य के लिहाज से कमजोर साबित होते हैं.

रिसर्च के नतीजे- बीसीबीएस एसोसिएशन का अध्ययन नई पीढ़ी के ऐसे 5.5 करोड अमेरिकियों पर केंद्रित था, जिनका व्यावसायिक बीमा हो. बीसीबीएस हैल्थ इंडेक्स के मुताबिक नई पीढ़ी के लोगों ने अच्छे स्वास्थ्य का पूरा आनंद लिया, खासतौर पर युवावस्था में तो उनका हैल्थ इंडेक्स 95.1 तक था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ वह जनरेशन एक्स की तुलना में पीछे होती जाती है. दूसरे शब्दों में नई पीढ़ी में पिछली पीढ़ी की उसी उम्र की तुलना में शीर्ष 10 समस्याएं ज्यादा पाई गई हैं.

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सबसे बड़ी 10 समस्याएं- बीसीबीएस हेल्थ इंडेक्स के आंकडों के मुताबिक 2014 से 2017 की पीढ़ी में इन समस्याओं की मौजूदगी में इज़ाफा देखा गया – गंभीर अवसाद, ड्रग्स या दवाओं पर बहुत ज्यादा निर्भरता (सबस्टेंस यूज डिसऑर्डर), शराब की लत, हाइपरटेंशन, बहुत ज्यादा बैचेनी (हाइपरएक्टिविटी), दिमागी परेशानी (साइकॉटिक डिसऑर्डर), क्रोन्स डिसीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस, हाई कोलेस्ट्रॉल, तंबाकू की लत और टाइप-2 डायबिटीज.

नई पीढ़ी में गंभीर अवसाद या डिप्रेशन (31 प्रतिशत) जैसी व्यवहार संबंधी स्वास्थ्य समस्याएं बहुत ज्यादा देखी गई। पिछली पीढ़ी की तुलना में नई पीढ़ी में हाइपरएक्टिविटी में 29 प्रतिशत का इज़ाफा देखा गया है. पिछली पीढ़ी की तुलना में टाइप 2 डायबिटीज के मामले 1.4 गुना बढ़े हैं.

रिसर्च से पता चलता है कि 10 से 24 वर्ष आयु के 30 प्रतिशत भारतीय युवाओं की दिनचर्या स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने वाली है. न केवल शराब जैसे व्यसनों में इज़ाफा हुआ है बल्कि पोषण में असंतुलन, बहुत जोखिम भरा यौन व्यवहार और सामान्य दिमागी बीमारियां भी ज्यादा देखने को मिल रही हैं.

नई पीढ़ी और अवसाद- आंकड़े बताते हैं कि नई पीढ़ी को शारीरिक स्वास्थ्य की तुलना में व्यवहार संबंधी बीमारियों (अन्य शब्दों में मानसिक परेशानियां) का ज्यादा सामना करना पड रहा है. स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक इसके लिए यह बातें खासतौर पर जिम्मेदार होती हैं :

सोशल मीडिया- नई पीढ़ी अपनी बातों को सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा शेयर करती है. फिर बात विचारों की हो, कामयाबी की हो या फिर छुट्टियों में मौज-मस्ती की. हर कोई एक अच्छी जिंदगी जीने की कहानी को बयां करना चाहता है. इस वजह से उन पर हमेशा तुलना और दूसरे की प्रतिक्रिया से सब कुछ तय होने का दबाव बढता जाता है.

दूसरे लोगों के सोशल मीडिया फीड को देखकर फोमो (फियर ऑफ मिसिंग आउट/किसी बात को मिस कर देने का भय) होना एक वास्तविकता है. वह चौबीसों घंटे सोशल मीडिया से जुडे रहने की मजबूरी को जन्म देता है क्योंकि उन्हें लगता है कि वह कुछ मिस न कर दें. यह स्थिति जब लंबी चलती है तो आत्मसम्मान गिरता है और डिप्रेशन बढ़ता है। रिसर्चरों का कहना है कि फोमो के कारण रास्ते में बिना किसी सजगता के चलने या अपनी धुन में ड्राइविंग के मामले देखने को मिलते हैं. साथ ही अपने प्रेजेंट यानी ‘वर्तमान’ को लेकर भी असंतुष्टि होती है.

सोशल मीडिया पर हमेशा एक्टिव रहने वाले नई पीढ़ी के 1787 लोगों पर 2014 में किए गए एक अध्ययन के बाद रिसर्चर्स ने पाया कि सात से ज्यादा सोशल मीडिया अकाउंट्स पर सक्रिय युवाओं (19 से 32 वर्ष आयु वर्ग) के केवल दो सोशल मीडिया से जुडे युवाओं की तुलना में अवसादग्रस्त और चिंतित होने की आशंका तीन गुना होती है.

साइबरबुलिइंग- मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ “चेतावनी या धमकी भरे आक्रामक इमेल्स, टैक्स्ट मैसेज या ऑनलाइन पोस्ट, शर्मसार या धमकाने वाले फोटो ऑनलाइन पोस्ट करने या किसी और के अकाउंट का इस्तेमाल कर शर्मसार या धमकाने वाले पोस्ट करने” को साइबर बुलिइंग कहते हैं। साइबर बुलिइंग का शिकार व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है और कई बार आत्महत्या के विचार तक उसके मन में आते हैं.

अकेलेपन का अहसास- पूरी दुनिया में एकाकीपन महामारी का रूप अख्तियार करता जा रहा है. ज्यादा से ज्यादा लोग अब अपने विचारों से सहमति वाले लोगों की खोज में स्क्रीन का ज्यादा सहारा लेने लग गए हैं. एक आकलन के मुताबिक भारत में 8 प्रतिशत शहरी युवा एकाकी महसूस करते हैं. 12 प्रतिशत कई बार डिप्रेशन महसूस करते हैं.

अनुसंधान बताता है कि जो अकेले रहते हैं उनके कम उम्र में मरने की आशंका बढ़ जाती है. इस समस्या से निपटने के लिए यूनाइटेड किंग्डम में तो मिनिस्टर ऑफ लोनलीनेस तक बना दिया गया है. जापान सरकार सोशल हब्स बना रही है ताकि लोगों को एक-दूसरे के साथ सीधे संवाद के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.

अच्छी खबर यह है कि पिछली पीढ़ी की तुलना में नई पीढ़ी अपनी मानसिक समस्याओं, चिंताओं को साझा करने और चिकित्सकों की मदद लेने को लेकर ज्यादा खुले विचारों की है. उन्हें चिंता और अवसाद के लिए चिकित्सक की मदद लेने में पिछली पीढ़ी की तरह की हिचक महसूस नहीं होती. ज्यादा जागरुकता और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन जैसे संस्थानों के रिसर्च भी एक ज्यादा सहायक माहौल बनाने में मदद कर रहा है.

वर्ल्ड फैडरेशन फॉर मेंटल हैल्थ ने 1992 से 10 अक्टूबर को हर साल वर्ल्ड मेंटल हैल्थ डे के तौर पर मनाने का फैसला किया. इसका उद्देश्य जरूरतमंदों के बीच समस्या के बारे में जागरुकता फैलाना और उन्हें उपचार उपलब्ध कराना है.

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