नई दिल्ली.  आयुष (आयुर्वेद, योगा और नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्ध और होमियोपैथी) मंत्रालय ने दक्षिण दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में यूनानी और सिद्ध मेडिसिन के केंद्र शुरू कर दिए हैं। राजधानी में परंपरागत चिकित्सा प्रणाली का यह तीसरा केंद्र है। नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल और दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन यूनानी मेडिसिन (सीसीआरयूएम) के दो यूनानी केंद्र पहले से ही चल रहे हैं।

यूनानी और सिद्ध परंपरागत चिकित्सा पद्धतियां हैं जो भारत में अंग्रेजी हुकुमत के दौर में पीछे छूटती चली गईं। दोनों का अपना इतिहास और पद्धति है। दोनों से मिलने वाले फायदें कई हैं। दोनों पर एक नजर-

यूनानी
मूल रूप से ग्रीस (यूनान) से उपजी यह चिकित्सा प्रणाली मध्य पूर्व एशिया से 11 वीं सदी में भारत पहुंची।

यूनानी चिकित्सा पद्धति ग्रीस के चिकित्सक हिप्पोक्रेटस (आपने हिप्पोक्रेटस की उस शपथ और हिप्पोक्रेटस के स्टाफ के बारे में जरूर सुना होगा जो पूरी दुनिया में चिकित्सकों के लिए प्रतीक की तरह है) की ‘फोर ह्यूमर थ्योरी ’ पर आधारित है। ह्यूमर (देहद्रव्य)-खून, कफ (फ्लेम), पीला पित्त (यलो बाइल), काला पित्त (ब्लेक बाइल)-ही हमारे शरीर की पाचन, विकास, मरम्मत और संरक्षण की प्रक्रियाओं को संभालते हैं।

यूनानी चिकित्सा पद्धति के मुताबिक हमारा शरीर सात वस्तुओं से बना है-तत्व (हवा, पानी, धरती, आग), स्वभाव, देहद्रव्य (ह्यूमर), अंग, प्राण, संकाय (फेकल्टिज) और कार्य। एक यूनानी डॉक्टर मरीज की धडकन, पेशाब या मल में जरा से भी बदलाव या खराबी को जान लेते हैं।

फेकल्टिज में शामिल होते हैं-हमारे शरीर की ऊर्जा के लिए खाने को पचाने की कुदरती ताकत और दिमागी ताकत। दिमाग और केंद्रीय, नर्वस सिस्टम के खाते में जाती है, जबकि महत्वपूर्ण शक्ति दिल में होती है, जो सभी अंगों को जिंदा और काम के लायक बनाए रखता है। बीमारी की गंभीरता के आधार पर यूनानी चिकित्सा पद्धति में आहार पर नियंत्रण से लेकर सर्जरी के बगैर इलाज किया जाता है।

सिद्ध
सिद्ध दक्षिण भारत की एक प्राचीन चिकित्सा पद्धति है, जिसमें रसविद्या की प्रक्रियाओं (अल्केमिकल प्रोसेस) और रासायनिक घोलों का इस्तेमाल करके इलाज किया जाता है।

वर्ष 2001 के एक लेख में बंगलौर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के अतिथि प्राध्यापक बी.वी. सुब्बारायप्पा, जो परंपरागत भारतीय औषधि के जानकार हैं, ने खुलासा किया कि सिद्ध प्रणाली चौथी सदी के दौरान विकसित हुई। इसके अलावा इस पर चीनी रसविद्या का प्रभाव है और यह पारे और उसके यौगिकों पर बहुत ज्यादा निर्भर है।

इसका उद्देश्यः “आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा के मुकाबले में, जो केवल इंसानी जिंदगी को यौवन या दीर्घायु बनाने की कोशिश के साथ मौत की हकीकत को स्वीकारते हैं, सिद्ध चिकित्सा पद्धति में अमरत्व हासिल करने का प्रयास होता है।” उन्होंने इंडियन अकादमी ऑफ साइंसेज से जर्नल ऑफ बायोसाइंसेज में प्रकाशित ‘’द रूट्स ऑफ एंशिएंट मेडिसिनः एन हिस्टोरिकल आउटलाइन’’ में यह लिखा है।

आयुष मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक यह चिकित्सा प्रणाली कई मायनों में आयुर्वेद की ही तरह है। यह विचार की इंसान का शरीर पंचतत्वों-धरती, पानी, हवा, आग और आकाश, से बना है दोनों ही में समान है। दोनों ही चिकित्सा पद्धतियां इन्हीं तत्वों के आधार पर आहार और दवा में बदलाव करते हैं। “दवा में मौजूद तत्व बदलते हैं और उनकी प्रमुखता किसी कदम या इलाज के लिए होती है।”

रसविद्या (किसी भी वस्तु को सोने में बदलना) से संबंध होने के कारण सिद्धा प्रणाली धातुओं, खनिजों और कई रासायनिक प्रक्रियाओं जैसे डिस्टिलेशन, फ्यूजन, फर्मेंटेशन, प्यूरिफिकेशन, लिक्विफिकेशन और एक्सट्रेक्शन की गहरी समझ पर आधारित है।

सिद्धा प्रणाली में त्वचा, आंखों, जीभ के अलावा रंग, गंध, घनत्व और मात्रा जानने के लिए पेशाब का परीक्षण किया जाता है। जानकारों के मुताबिक इस पद्धति में महिला के प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य, खासतौर पर प्रजनन क्षमता में इजाफे पर विशेष जोर दिया जाता है।

2014 में मोदी सरकार ने आयुष मंत्रालय की स्थापना कर इन चिकित्सा पद्धतियों को नया जीवन दे दिया। रिसर्च और क्लिनिकल ट्रायल्स शुरू हो चुके हैं-सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन सिद्ध मेडिसिन (सीसीआरएस) ने 13 सितंबर, 2019 को सफदरजंग अस्पताल में सिद्ध व यूनानी केंद्रों के उद्घाटन के वक्त मेडिसिन में जर्नल ऑफ रिसर्च के दूसरे संस्करण का विमोचन किया। आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों से तुलना के लिहाज से यह शुरुआती दिन हैं। हमें इनके प्रभावों को जानने के लिए अभी और कई गहन अध्ययन करने होंगे।

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