नई दिल्ली. भारतपर्व में हम लगातार भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक पहलूओं पर चर्चा कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हम भारत के मंदिरों को समझने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि अगर आपने भारत के मंदिरों को समझ लिया तो आपने भारत को समझ लिया.
 
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शक्तिपीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं, देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है जबकि देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है, वहीं तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं. इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं. भारत-विभाजन के बाद 5 शक्तिपीठ कम हो गए और अब भारत में 42 शक्तिपीठ रह गए हैं. एक शक्तिपीठ पाकिस्तान में चला गया और 4 बांग्लादेश में और शेष 4 पीठों में एक-एक श्रीलंका तथा तिब्बत में तथा दो शक्तिपीठ नेपाल में है.
 
 
देवी भागवत के अनुसार शक्तिपीठों की स्थापना के लिए भगवान शिव स्वयं भू-लोक में आए थे और दानवों से शक्तिपिंडों की रक्षा के लिए अपने विभिन्न रूद्र अवतारों को उत्तरदायित्व दिया. यही कारण है कि सभी 51 शक्तिपीठों में आदिशक्ति का मूर्ति स्वरूप नहीं है, इन पीठों में पिंडियों की आराधना की जाती है. साथ ही सभी पीठों में भगवान शिव की रूद्र भैरव के रूपों की भी पूजा होती है. इन पीठों में कुछ तंत्र साधना के मुख्य केंद्र हैं.
 
पाकिस्तान में हिंगलाज शक्तिपीठ
हिंगलाज माता मंदिर शक्तिपीठों में पहला शक्तिपीठ माना जाता है. पाकिस्तान के बलूचिस्तान राज्य की राजधानी कराची से 120 किमी उत्तर-पश्चिम में हिंगोल नदी के तट पर ल्यारी तहसील के मकराना के तटीय क्षेत्र में हिंगलाज में स्थित है, हिंगोल नदी किनारे अघोर पर्वत पर है. यहीं माता का ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था.
 
यह इलाका पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बॉर्डर पर है. मान्यता है कि माता सती के शरीर का पहला टुकड़ा अर्थात सिर का एक भाग यहीं अघोर पर्वत पर गिरा था. इस स्थान को हिंगलाज, हिंगुला, कोटारी और नानी का मंदिर नाम से जाना जाता है, यह मंदिर मानव निर्मित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक रूप से हुआ है.शक्तिपीठ बांग्लादेश के खुलना ज़िले के जैसोर नामक नगर में स्थित है| यहाँ