Tawayaf Life: संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज़ हीरामंडी के बाद तवायफों की जिंदगी और उनके इतिहास को लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है. आम धारणा में तवायफों को अक्सर केवल जिस्मानी रिश्तों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इतिहास और कई किताबों में उनकी जिंदगी का एक अलग पहलू भी सामने आता है. पुराने समय में कई कोठे सिर्फ मनोरंजन की जगह नहीं थे, बल्कि वहां संगीत, शायरी, नृत्य और अदब की शिक्षा भी दी जाती थी. कम उम्र से ही लड़कियों को आगे की जिंदगी के लिए तैयार किया जाता था. उनका प्रशिक्षण काफी अनुशासित माना जाता था और उन्हें कला की बारीकियां सिखाई जाती थीं.
उर्दू, फारसी और शायरी की दी जाती थी तालीम
तवायफों की शिक्षा में उर्दू और फारसी का खास महत्व था. उन्हें शायरी और गजल की समझ दी जाती थी, ताकि वे महफिल में अपनी बात खूबसूरती से रख सकें और शेर-ओ-शायरी को समझ सकें. इसके साथ ही उन्हें अदब, तहज़ीब और बातचीत का सलीका भी सिखाया जाता था. महफिल में कैसे बैठना है, किससे किस तरह बात करनी है और मेहमानों का सम्मान कैसे करना है, ये बातें उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा थीं. नजाकत और शालीनता को भी उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा माना जाता था. इस तरह उनका प्रशिक्षण केवल कला तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक व्यवहार और प्रस्तुति पर भी जोर दिया जाता था.
संगीत और नृत्य से रिझाती थी मर्द
संगीत तवायफों की जिंदगी का एक अहम हिस्सा था. उन्हें बचपन से ही गायन और संगीत की शिक्षा दी जाती थी. इसके लिए कई जगहों पर बाहर से उस्ताद और गुरु बुलाए जाते थे. संगीत के साथ उन्हें कथक जैसे नृत्य की भी ट्रेनिंग दी जाती थी. महफिल में गाना, नृत्य करना और श्रोताओं से संवाद बनाए रखना उनकी कला का हिस्सा था. कुछ विवरणों में कोठों पर शतरंज जैसे खेलों और महफिल सजाने के तौर-तरीकों की शिक्षा का भी उल्लेख मिलता है. हालांकि अलग-अलग समय और जगहों पर तवायफों की जिंदगी और उनकी भूमिका अलग रही थी. इसलिए उनके इतिहास को केवल एक ही नजरिए से देखने के बजाय उस दौर की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझना जरूरी है.