बॉलीवुड डेस्क, मुंबई. दुनियां के सबसे तेज ड्रैग फ्लिकर संदीप सिंह की बायोपिक सूरमा आज रिलीज हो गई है. पहली प्रतिक्रिया के तौर पर जानना चाहें तो वो ये है कि हर युवा जो जीवन में तमाम परेशानियों से जूझते हुए अपने गोल को बदल देता है उसको ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए. लेकिन ये भी सही बात है कि ये बायोपिक जिस लेवल की बननी चाहिए थी, उस गोल को नहीं पा सकी. यानी इसका बॉक्स ऑफिस का ‘सूरमा’ बनना थोड़ा मुश्किल लगता है.

अगर ये फिल्म अपने गोल से चूकती है तो इसकी तीन वजहें हो सकती हैं. चूंकि इंडियन हॉकी को भी पैसे की जरुरत है और आज के दौर में ना बढ़ पाने की ये एक बड़ी वजह है, उसी तरह ये मूवी भी पैसे की कमी की शिकार लगती है. जिस ग्रांड लेवल पर एक स्पोर्ट्स फिल्म का सेलीब्रेशन होना चाहिए, उसमें ये फिल्म चूक जाती है, वैसे इसकी प्रोडयूसर एक्ट्रेस चित्रांगदा सिंह है. दूसरी बड़ी वजह ये है कि दिलजीत सिंह उम्दा कलाकार हैं, काफी मेहनत करते हैं और की भी है, लेकिन उनकी स्टार पॉवर अभी इतनी नहीं हुई कि अकेले अपने कंधों पर पूरी मूवी उठा सकें. उडता पंजाब में शाहिद, करीना और आलिया जैसे स्टार्स थे तो फिल्लौरी अनुष्का शर्मा की फिल्म थी, जो ज्यादा चली नहीं.

तीसरी वजह जो लगी वो है मूवी का कमजोर क्लाइमेक्स, शायद दर्शक और बेहतर की उम्मीद कर रहे थे, जो बड़ा ड्रामा क्लाइमेक्स में हो सकता था, उससे शाद अली चूक गए. उन्हें क्लाइमेक्स को दंगल की तरह और खींचना था, भले ही कोई भी किरदार या सीन और डालना पड़ता.

शाद अली साथिया और बंटी बबली की कामयाबी को दोहरा नहीं पाए हैं, उनकी पिछली तीनों फिल्में झूम बराबर झूम, किल दिल और ओके जानूं चली नहीं. ऐसे में सूरमा उनसे शायद बेहतर करेगी, लेकिन कई फिल्में आज क्लाइमेक्स पर ही चूक रही हैं, रईस भी उनमें से थी, तो शाद को ध्यान देना चाहिए था. हालांकि फिल्म के डायलॉग्स अच्छे हैं, जैसे विजय राज का, ‘तमंचे को कच्छे में रख लो बचुआ, बिहारी हैं हम, थूक के माथा पर छेद कर देंगे’. या फिर तापसी का, ‘जिंदगी में कोई गोल होगा तब ना गोल हो पाएगा’. फिल्म के दो गाने अच्छे बन पड़े हैं सूरमा टाइटिल सिंह और इश्क दी बाजियां. म्यूजिक शंकर एहसान लॉय का है.

फिल्म की कहानी हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह की है, जो एक हॉकी खिलाड़ी के प्यार में पड़कर हॉकी में अपनी किस्मत आजमाता है. उसका भाई विक्रम उसका एक ऐसा हुनर उसको बताता है, जो उसको खुद पता नहीं था. हॉकी की एक टेक्नीक ड्रैग फ्लिक का वो मास्टर था, हर पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने की खूबी. उसी के चलते उसे इंडियन टीम में ले लिया जाता है, लेकिन एक दिन शताब्दी एक्सप्रेस में किसी पुलिस वाले से गलती से चली गोली उसका कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज कर देती है. ऐसे में वो दो साल फील्ड से बाहर रहता है. उस चोट से उबरना, फिर हॉकी में वापसी करना, वापसी करके इंडियन टीम का कप्तान बनना, ड्रैग फ्लिकिंग में स्पीड का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाना और भारत को 13 साल बाद अजलान शाह हॉकी कप दिलवाना, यही है उसकी कहानी.

इस कहानी में उसकी लव स्टोरी को अलावा भी कई इमोशनल पल थे कि कैसे उसके परिवार को इलाज के चलते अपना घर बेचना पड़ता है, बीमार पिता को फिर से अपनी नौकरी ज्वॉइन करनी पड़ती है. हालांकि कई इमोशनल पल शाद अली चूक गए, जिस दिन उसने ड्रैग फ्लिकिंग में रिकॉर्ड बनाय़ा, उस दिन संदीप सिंह का जन्मदिन भी था. हालांकि एक्टर्स सारे बेहतरीन हैं, तापसी और दिलजीत ने काफी मेहनत की है. सतीश कौशिक, अंगद बेदी, कुलभूषण खरबंदा आदि अपने रोल्स में जमे हैं, लेकिन हमेशा की तरह विजय राज ने अपने तेवरों से जान डाल दी दी है. बावजूद इसके फिल्म उस हाइट को नहीं पहुंच पाई, जिस पर एक स्पोर्ट्स बेस्ड बायोपिक को पहुंचना चाहिए. फिर भी संदीप सिंह की कहानी प्रेरणा तो देती ही है, इसलिए युवाओं को पसंद भी आएगी.

स्टार ***
सूरमा मूवी रिव्यू
स्टार कास्ट- दिलजीत दोसांझ, तापसी पन्नू, अंगद बेदी
निर्देशक- शाद अली मूवी

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