Shikara Movie Review: इस मूवी का कश्मीरी पंडितों और के दर्द में शामिल करोड़ों लोगों को इंतेज़ार था, इस चाहत में कि ये मूवी उनके पलायन की सच्ची कहानी बड़े परदे पर ईमानदारी से लेकर आएगी. बिल्कुल वैसा ही इंतजार जैसा प्रकाश झा की मूवी आरक्षण से था. लेकिन शिकारा भी आरक्षण की तरह ही निकली, बस एक परिवार की कहानी, मूल मुद्दे के साए में पली एक लव स्टोरी, उस हादसे से जूझते एक कश्मीरी पंडित जोड़े की प्रेम कहानी. जो अपनी जिंदगी के खलनायकों से खफा नहीं है, उनके लिए लड़ाई नहीं लड़ता. तमाम हिंदूवादी दर्शकों को ये देखकर निराशा हो सकती है कि वो भारत की सरकार या पीएम से गुहार लिखने के बजाय तीस साल तक अमेरिकी राष्ट्रपति को ही खत लिखता रहता है.

यही एक पहलू ऐसा है, जिससे साफ लगता है कि डायरेक्टर के इरादे कश्मीरी पंडितों की व्यथा दिखाने के बजाय इंटरनेशनल अवार्ड्स जीतने के हैं. आप उनकी तारीफ में ये भी सकते हैं कि जुल्म ओ सितम की ये कहानी उन्होंने प्रेम के नजरिए से दिखाई है. कहानी है शिवम धर (आदिल) और शांति धर (सादिया) की, शिव नज़्में लिखते हैं शिकारा नाम की मैगजीन में, शांति उनकी नज्मों की दीवानी हैं. प्रेम परवान चढ़ता है तो घर का नाम भी शिकारा रख लेते हैं. प्रेम की इस कहानी में हिन्दू मुस्लिम प्रेम भी है, शिव का दोस्त लतीफ, जो उसकी लव स्टोरी से लेकर घर बनाने तक में मदद करता है।

लतीफ के अब्बा नेता हैं, एक रैली में पुलिस लाठी चार्ज में उनकी मौत हो जाती है तो वो आतंकी बन जाता है, फिर भी शिव के परिवार को वहां से जम्मू निकलने में मदद करता है. राष्ट्रवादी पार्टी नाम से एक पार्टी के लोग पंडितों को टमाटर बांटने का सीन एक तरह से हिंदूवादी दलों के मजाक उड़ाने जैसा है, उनको वो सीन भी शायद ही पसंद आए, जिसमें पलायन करके रिफ्यूजी कैंप में रह रहा शिव ‘ मंदिर वहीं बनाएंगे ‘ नारा लगा रहे बच्चों के बहाने मंदिर के लिए लड़ रहे नेताओं को उपदेश देता है लीडर का काम जोड़ने का होता है, तोड़ने का नहीं.

पूरी मूवी में ना कशमीर के नेता विलेन दिखते है, ना वहां की मस्जिदों से लाउड स्पीकर से ऐलान करने वाले मौलवी और ना ही आतंकी सरगना, हां कुछ समय के लिए भारत सरकार जरूर दिखती है और मौके का फायदा उठाकर उनके घरों को सस्ते में खरीदने वाले कुछ कश्मीरी भी. पूरी मूवी में प्रेम दिखता है. फिल्म की लीड जोड़ी से लेकर गीतकार इरशाद कामिल और संगीतकार के तौर पर ए आर रहमान को जोड़ने का फैसला भी शायद इसीलिए लिया गया होगा. हालांकि इन सबने अपना बेस्ट दिया है. लेकिन ये अखरता है कि एक भी कश्मीरी पंडित भारत को लेकर अपना इमोशनल लगाव शो करता नहीं दिखाया गया है.

वो भी तब जब ये कहानी एक कश्मीरी पंडित राहुल पंडित ने लिखी है, फिल्म की नायिका कशमीर को अपना वतन बोलती है, लेकिन भारत को नहीं, बल्कि वो जिस तरह से जम्मू की एक शादी में बैंड बाजों के शोर से परेशान होकर कश्मीरी परम्पराओं की शादी को याद करते हैं, राम मंदिर आंदोलन पर सवाल उठाते हैं, उससे लगता नहीं है कि ये मूवी पूरा सच है. कश्मीरी पंडितों का अब तक साथ से रहे हिंदूवादियों को भी निराश करेगी. जितनी बार अमेरिकी प्रेसिडेंट का नाम लिया जाता है, उतनी बार भारतीय पीएम का तो छोड़िए भारत का नाम भी नहीं लिया जाता. इससे एक बात साफ है कि डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा अब ऑस्कर पाना चाहते हैं और ये मूवी इंटरनेशनल ऑडिएंस के लिए बनाई गई है.

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