किसी ने सही कहा है कि प्रेम को सरहदों, मज़हबों और वक्त के दायरे में नहीं बांधा जा सकता है. जी हां, कुछ ऐसी ही प्रेम कहानी है कवि और गीतकार साहिर लुधियानवी और पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम की. कई दशकों से लोगों को इनकी लव स्टोरी बताई जाती रही है. दोनों के बीच में इमरोज नाम के भी शख्स थे, जो अमृता प्रीतम से बहुत इश्क करते थे. लेकिन अमृता प्रीतम के मन में साहिर बैठे थे. आइए जानते हैं
कैसे हुई थी दोनों के प्रेम की शुरुआत?
साहिर और अमृता प्रीतम के बीच सबकुछ साल 1944 में शुरू हुआ, जब पहले से शादीशउदा अमृता की मुलाकात उस वक्त के उभरते कवि और गीतकार साहिर से पहली बार हुई. फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार इनकी मुलाकात लाहौर और दिल्ली के बीच स्थित एक गांव में आयोजित मुशायरे में हुई थी. कहा जाता है कि फिल्मों की तरह ही उनका प्रेम पल भर में पनप गया. अमृता की सुंदरता, शब्दों पर उनकी पकड़ और साहिर का जुनून और आदर्शवाद ने दोनों को नजदीक लाने में अहम रोल अदा किया.
साहिर के प्यार में दीवानी थीं अमृता
ऐसा माना जाता है कि अमृता को साहिर से गहरा प्रेम था और वह अपनी नाखुश शादीशुदा से बाहर निकलना चाहती थीं, लेकिन साहिर ने कभी इस रिश्ते को गंभीरता से नहीं लिया. अपनी जीवनी ‘रसीदी टिकट’ में अमृता प्रीतम ने साहिर के साथ बिताए उन पलों का जिक्र किया है, जब वह लाहौर में उनके घर आया करते थे. साहिर के जाने के बाद अमृता उनकी पी हुई सिगरेट की बची हुई बडों को संभालकर रखतीं और उन्हें होठों से लगाकर साहिर को महसूस करती थीं. धीरे-धीरे यही आदत उन्हें सिगरेट की लत तक ले गई, जो जीवनभर उनके साथ रही.
दूर होकर भी साहिर के करीब रहीं अमृता प्रीतम
साहिर के साथ नजदिकियों के बारे में अमृता के पति को पता चला. इसका परिणाम ये हुआ कि उनके रिश्तों में तनाव आ गया. साहिर इसी बीच फिल्मों में लिखने के लिए मुंबई आ गए. अमृता दिल्ली में रह रही थी. धीरे-धीरे साहिर के कई अफेयर्स की खबरें आने लगीं. लेकिन अमृता प्रीतम के मन में साहिर के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ.
इमरोज की पीठ पर लिखती थीं साहिर का नाम
इसके बाद अमृता के जीवन में खालीपन को भरने का जिम्मा चित्रकार इमरोज़ पर आ गया, लेकिन यह बहुत बाद में हुआ. आखिरकार अमृता ने अपनी शादी तोड़ दी और कहा जाता है कि वह इमरोज़ के साथ चार दशकों तक रहीं, लेकिन उन्होंने कभी शादी नहीं की. कहा जाता है कि जब इमरोज स्कूटर से अमृता प्रीतम को लेकर जाते थे, तो अमृता प्रीतम उनकी पीठ पर साहिर का नाम लिखती थीं. यह बात इमरोज को पता थी, लेकिन कभी कहते नहीं थे, क्योंकि वो भी साहिर का बहुत सम्मान करते थे.
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