Mahesh Bhatt Osho Conflict: सन 1970 के दशक में, दिग्गज फिल्म निर्माता महेश भट्ट पुणे स्थित रजनीश उर्फ ओशो के आश्रम में नियमित रूप से जाते थे और उनके अनुयायी बन गए थे. लेकिन जल्द ही उन्होंने ओशो पंथ को त्याग दिया, जिसके कारण ओशो के साथ उनका कड़वा मतभेद हो गया.
इसके बाद उन्होंने यू.जी. कृष्णमूर्ति को अपना आध्यात्मिक साथी बनाया. महेश की सबसे बड़ी बेटी पूजा भट्ट ने हाल ही में एक बातचीत में खुलासा किया कि उन्हें वह उथल-पुथल भरा समय अच्छी तरह याद है जब उनके पिता ने ओशो से नाता तोड़ लिया था.
ओशो हुए थे नाराज़
पूजा ने साइरस सेज़ पॉडकास्ट पर अपने पिता के ओशो आश्रम जाने को लेकर कहा, “मेरे पिता रजनीश संप्रदाय के सदस्य थे. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने अपनी माला गले से उतारकर शौचालय में बहा दी थी. उसके बाद उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया. वे भगोड़े घोषित हो गए थे. मुझे याद है विनोद खन्ना के माध्यम से मेरी माँ को एक संदेश मिला था, ‘भगवान बहुत क्रोधित हैं. भगवान महेश का नाश करने वाले हैं.’ जब मैं बच्ची थी, तो हमें आधी रात को पुणे के एक सुरक्षित ठिकाने पर ले जाया गया था.” पूजा ने कहा कि ओशो को किसी का दूर जाना बिल्कुल पसंद नहीं था. उन्होंने कहा, “उन्हें यह पसंद नहीं था कि कोई उनसे दूर चला जाए.”
ओशो आश्रम जा चुकी हैं पूजा
पूजा भट्ट ने ये भी बताया कि वह बचपन में ओशो से मिल चुकी हैं. उन्होंने बताया कि वो बचपन में ओशो के आश्रम में गई थीं. उन्होंने बताया कि जब कोई ओशो से मिलने जाता था, तो वो उनको सूंघते थे. इसके अलावा आश्रम में जाने वाले लोग इत्र या शैंपू का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे.
महेश भट्ट और ओशो के बीच मतभेद
कुछ साल पहले महेश भट्ट ने भी बताया था कि वे ओशो के अनुयायी कैसे बने. कबीर बेदी अभिनीत फिल्म ‘मंज़िलें और भी हैं’ (1974) और संजीव कुमार अभिनीत फिल्म ‘विश्वासघात’ (1977) के बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप होने के बाद, महेश टूट गए थे और इसी समय उन्होंने आध्यात्मिक विकास के लिए ओशो के आश्रम में शरण ली. लेकिन कुछ समय बाद महेश भट्ट को ये ठीक नहीं लगा और उन्होंने ओशो से मुंह मोड़ लिया.