बॉलीवुड डेस्क, मुंबई. आमतौर पर कई फिल्मों का ट्रेलर ऐसे तैयार किया जाता है कि उसमें सस्पेंस एलीमेंट की गुंजाइश रहती है. अनुभव सिन्हा के ट्रेलर से पता तो चल रहा था कि फिल्म किस दिशा में जाएगी, लेकिन ये नहीं पता था कि फिल्म की पूरी कहानी इसी ट्रेलर में है, यानी एक मुस्लिम फैमिली, जिसका एक बच्चा बहकावे में आकर आतंकी घटना को अंजाम देता है और फिर उसके परिवार को भुगतनी पड़ती है तमाम दिक्कतें. पुलिस की तरफ से भी और समाज की तरफ से भी. हालांकि सोशल मीडिया पर जैसे तेवर अनुभव सिन्हा के रहते हैं, उस एजेंडे से तो वो बचे लेकिन फिर भी राष्ट्रीय एकता के मैसेज के साथ साथ वो एक हिडिन मैसेज भी छोड़ गए.

फिल्म की कहानी है एक ऐसे मुस्लिम परिवार की जो वाराणसी में रहता है. मुराद अली (ऋषि कपूर) एक वकील हैं, उनका बेटा विदेश में कोई बिजनेस करता है, जिसने एक हिंदू लडकी आरती (तापसी) से शादी की थी, जो पति से नाराज होकर ससुराल आ जाती है, वो भी वकील है, मुराद की पत्नी के रोल में नीना गुप्ता हैं. बिलाल (मनोज पाहवा) मुराद का छोटा भाई है, जो मोबाइल की दुकान चलाता है, उसका बड़ा भाई एक घर में रहते हुए उससे बात नहीं करता.

बिलाल का बेटा शाहिद (प्रतीक बब्बर) एक आतंकी की बातों में आकर इस्लाम की मदद के लिए एक बस में बम रख देता है, जिससे 16 लोग नाराज हो जाते हैं. उसका एनकाउंटर एक मुस्लिम पुलिस ऑफिसर (रजत कपूर) कर देता है. पुलिस बिलाल को उठा लेती है, उसकी शॉप से 14 सिम गायब हैं, उसी दिन उसके नाम से पाकिस्तान से हवाला के जरिए एक लाख रुपया आया था और उसके घर में कम्यूटर में तमाम आपत्तिजनक वीडियोज और घर में एक अवैध टेलीफोन एक्सचेंज मिलता है. बाद में इस केस में मुराद को भी आरोपी बना दिया जाता है.

कैसे सरकारी वकील के रोल में आशुतोष राणा इस परिवार के बहाने पूरी मुस्लिम कौम पर जेहाद से लेकर जनसंख्या तक बढ़ाने के सवाल, आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाता है और कैसे सुबूतों के साथ उनकी बहू आरती मोहम्मद उसके आरोपों को खारिज करती है, यही है फिल्म की कहानी, यानी जैसा ट्रेलरक में दिख रहा था वैसे ही है.

एक्टिंग के मामले में देखेंगे, तो ऋषि कपूर से भी बेहतर रोल में हैं तापसी पन्नू और मनोज पाहवा. जान डाल दी है दोनों ने मूवी में, कुछ हद तक आशुतोष राणा भी जमे हैं. कलाकार सारे ही मंझे हुए हैं, इसलिए कई कलाकारों के हिस्से में बेहतर सीन अगर नहीं आए, जैसे कुमुद मिश्रा या नीना गुप्ता के रोल में तो ये डायरेक्टर का फैसला रहा होगा. फिल्म में ठेंगे से.. गाना काफी अच्छी शुरूआत फिल्म को देता है.

फिल्म अगर दर्शकों को अखरेगी तो इसलिए क्योंकि पूरी फिल्म कोर्टरूम ड्रामा है, ट्रेलर के अलावा कोई बड़ा सस्पेंस एलीमेंट फिल्म में नहीं है. सबसे बड़ी बात फिल्म में कोई विलेन नहीं है, सरकारी वकील ज्यादा जरूर बोलता है, लेकिन वो उसके लिए सुबूत भी पेश करता है. पुलिस कहीं से भी विक्टिमाइज करने की कोशिश नहीं करती, किसी नेता या संगठन का हाथ इसमें नहीं होता. इसमें कहीं भी दो राय नहीं होती कि उनके परिवार का लड़का आंतकी है और 16 लोग उसने मारे हैं.

उसके बाप बिलाल की गिरफ्तारी भी सुबूत, आतंकी को लिफ्ट देने का सीसीटीवी, पाकिस्तान से हवाला के जरिए पैसा और घर में अवैध टेलीफोन एक्सचेंज की बरामदगी उसकी गिरफ्तारी को जस्टीफाई करती लगती है. जो लोग उनके घर पर पाकिस्तान चले जाने के नारे जैसे लगातै हैं, या पत्थर फेंकते हैं, उन्हें भी मौका 16 हत्याओं के बाद ही मिलता है. सो कोई भी बड़ा विलेन नहीं लगता.

वहीं डायरेक्टर जहां एक तरफ तापसी और ऋषि कपूर के किरदारों के जरिए हिंदुओं पर सवाल उठाता है, वहीं मुस्लिम कम्युनिटी को भी क्लीन चिट नहीं देता. 16 हत्याओं के बाद, पाकिस्तान से हवाला मनी मंगाने के बाद, ऐसा करना मुश्किल था. तापसी के किरदार का बच्चों के मजहब को लेकर पति से झगड़े का भी विवाद मुस्लिम कम्युनिटी पर सवाल उठाता है. सो फिल्म राष्ट्रीय एकता की तरफ जाती लगती है, सो काफी बेलेंसिंग लगती है. लेकिन विलेन और सरप्राइज ऐलीमेंट की कमी काफी खलती है. चूंकि कोर्टरूम ड्रामा है, इसलिए डायलॉग्स दमदार डालने की कोशिश की गई है, कुछ हद तक कामयाबी भी मिली है.

जिस तरह से अनुभव सिन्हा ने एक खास तरह की विचारधारा के खिलाफ पिछले कुछ महीनों से अपने ट्विटर एकाउंटर पर माहौल बनाया, मुसलमानों को लेकर एक सर्वे खुद जारी किया, और फिल्म में एक भी मुसलमान एक्टर नहीं लिया, उससे लग रहा था कि फिल्म किसी खास एजेंडे पर हो सकती है. लेकिन फिल्म देखकर ये आमिर की फिल्म ‘सरफरोश’ के सलीम जैसे किरदारों को आगे बढ़ाती दिखती है.

ये अलग बात है कि अनुभव ने चौबे के किरदार के जरिए उसे मीट खाता दिखाकर, ऋषि कपूर के खिलाफ जाता दिखाकर, उसके बेटे का हिंदूवादी पार्टी में जाता दिखाकर उसको नेगेटिव और दूसरे दलित दोस्त सोनकर को मुस्लिम मुराद अली के मुसीबत में भी साथ दिखाकर एक दलित-मुस्लिम दोस्ती का हिडिन मैसेज दिया लगता है. तापसी भी जब इस्लामी टैररिज्म का बचाव करते हुए कहती हैं कि अनटचेबिलिटी से बड़ा कौन सा टैरर है? तो इसे और हवा लगती है. वो फिर गौडसे की जाति ब्राह्मण पर भी सवाल उठाती है.

लेकिन बतौर फिल्म एंटरटेनमेंट वैल्यू उतनी नहीं है क्योंकि रोमांस, कॉमेडी तो ना के बराबर थे ही, ऑडियंस को फिल्म में ऐसा कुछ नहीं मिला, जो उनके लिए सरप्राइजिंग था, जैसा ट्रेलर वैसी फिल्म. हां, अगर एंटरटेनमेंट के मूड से ना जाएं और केवल मुल्क के लिए देखें, तो आप मुल्क के एक तबके की परेशानी जरूर समझ सकते हैं, जो सोशल मीडिया के दौर में बच्चों की सोच से भी जूझ रहा है और उनकी गलती की वजह से घर के बाहर के लोगों के फौरन गद्दार करार दिए जाने की आदत से भी.

स्टार -3

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