बॉलीवुड डेस्क, मुंबई. करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस ने कलंक के तौर पर इस बार काफी हैवी मूवी बनाई है, जो आम किस्म के एंटरटेनमेंट की तलाश में जा रही ऑडियंस के सर के ऊपर से भी निकल सकती है. स्टार कास्ट पहले से ही हैवी है- संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, वरुण धवन, आलिया भट्ट और आदित्य रॉय कपूर तो हैं हीं, कुणाल खेमू, सोनाक्षी सिन्हा, कियारा आडवाणी और कीर्ति सनन भी नजर आएंगे. विशालकाय और भव्य सैट्स भी देखने को मिलेंगे और 1945 के दौर को फिल्माने के लिए अलग से की गई मेहनत भी साफ दिखती है. ऐसे में कलंक की लम्बाई 2 घंटे 48 मिनट की जगह सवा दो घंटे के आसपास होती तो फिल्म का ये हैवीपन खत्म हो सकता था.

कहानी 1945 में लाहौर की हीरामंडी और हुस्नाबाद की है. हीरामंडी जहां लोहारों का इलाका है, वहीं तवायफों के लिए भी ये इलाका बदनाम रहा है. उसी शहर में बलराज चौधरी (संजय दत्त) अपना अखबार निकालते हैं, जिसे बाद में विदेश से आया उनका बेटा देव (आदित्य रॉय कपूर) संजीदगी से संभालता है और प्रस्तावित बंटवारे के खिलाफ लिखता है. माधुरी दीक्षित का किरदार एक ऐसी तवायफ का है, जिसने नाचना छोड़ दिया है, बस गाना सिखाने में मशरूफ है. सोनाक्षी सिन्हा यानी सत्या चौधरी देव की पत्नी के रोल में हैं और कैंसर से जूझ रही है, आलिया भट्ट की देव से मजबूरी में शादी तो हो जाती है, लेकिन वो उसे अपना नहीं पाता.

तो प्यार की तलाश में शादीशुदा आलिया हीरामंडी के लोहार जफर (वरुण धवन) के प्रेम जाल में फंस जाती है, जो चौधरी परिवार से अपना पुराना इंतकाम लेना चाहता है, डो खुद को बात बात पर नाजायज औलाद बताता है. मूवी में एक और कहानी साथ साथ चल रही है, जफर का दोस्त कुणाल खेमू चौधरी परिवार से इसलिए नाराज है क्योंकि वो स्टील इंडस्ट्री शहर में लाने के समर्थन में हैं, जबकि इससे लोहारों का धंधा बंद हो सकता है. आखिर में चौधरी परिवार को साम्प्रदायिक हिंसा के चलते शहर छोड़ना पड़ता है, ऐसे में आलिया की मोहब्बत और वरुण के इंतकाम का क्या होता है? ये जानना काफी दिलचस्प होगा.

कभी इस मूवी का सपना करण जौहर के पिता य़श जौहर ने देखा था और 15 साल पहले श्रीदेवी को माधुरी के रोल में साइन भी कर लिया गया था. लेकिन जब बनी तो एक नए लडके अभिषेक वर्मन को इसे लिखने और डायरेक्ट करने की जिम्मेदारी दी गई, जो जोधा अकबर जैसी पीरियड मूवी में असिस्टेंट डायरेक्टर रह चुके हैं, अर्जुन कपूर की टू स्टेट को डायरेक्ट कर चुके हैं. इस मूवी में हर कोई किसी ना किसी ऐसे रिश्ते में फंसा है, जो उनके दिल की फांस बना है. संजय दत्त माधुरी के साथ, माधुरी वरुण के साथ, वरुण आलिया के साथ, आलिया आदित्य के साथ, आदित्य सोनाक्षी के साथ और कियारा आढवाणी वरुण के साथ. इसलिए रिश्तों के इन इमोशंस का काफी हैवी डोज हो गई है, मूवी भी इसके चलते 2 घंटे 48 मिनट की हो गई है, जो छोटी होती तो ज्यादा मजा आता.

बुल फाइटिंग और रावण दहन का सीन भव्य जरुर था, लेकिन कहीं से भी मूवी के पीरियड से मैच नहीं खाता. कुछ बातें और कनविंसिंग नहीं लगतीं जैसे आलिया शादी के लिए इतनी जल्दी राजी कैसे हो गई, वरुण और आदित्य के किरदार एक दूसरे को जानते कैसे नहीं थे और आखिर में कुणाल खेमू इतना पागल की तरह क्यों बर्ताव करने लगता है? जाहिर है डायरेक्टर को कहानी आगे बढ़ानी थी, इतनी बड़ी स्टार कास्ट में सोचा होगा कि लोग कुबूल लेंगे. तो कितने लोग इस हैवी बजट और हैवी इमोशंस की मूवी को दिल से कुबूल कर पाते हैं ये तो पता नहीं लेकिन अलग किस्म की मूवी देखने वालों को जरुर देखनी चाहिए.

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