Aditi Paudel Literacy Ambassador: जापान में रहने वाली 17 वर्षीय हाई स्कूल छात्रा अदिति पौडेल की कहानी इस बात की मिसाल है कि किताबों से जुड़ाव किस तरह जीवन की दिशा बदल सकता है. जापान में जन्मीं और नेपाल में बचपन बिताने वाली अदिति को हाल ही में जापान की पहली Literacy Ambassador (साक्षरता राजदूत) नियुक्त किया गया है. यह जिम्मेदारी उन्हें पढ़ने के प्रति उनके जुनून और शिक्षा को लेकर उनकी सोच के कारण मिली है.
अदिति को पढ़ने की सबसे पुरानी याद अपने प्रीस्कूल के दिनों की है. उनके दादाजी ने उन्हें देवनागरी लिपि में छपा एक अखबार दिया था. उस उम्र में भी अदिति उसमें लिखे शब्दों को समझने की कोशिश करती थीं और उनकी यह रुचि परिवार के लिए खास थी. बाद में उनके पिता ने भी उनकी पढ़ने की आदत को बढ़ावा दिया और उनके लिए बड़ी संख्या में किताबें खरीदीं. अदिति ने कम उम्र में ही फैंटेसी साहित्य पढ़ना शुरू किया और Enid Blyton की ‘The Wishing-Chair’ उनकी पसंदीदा किताबों में शामिल रही.
Malala की किताब ने बदली सोच
अदिति की पढ़ने की दुनिया केवल कहानियों तक सीमित नहीं रही. Malala Yousafzai की आत्मकथा ‘I Am Malala’ पढ़ने के बाद महिला शिक्षा और सशक्तीकरण को लेकर उनकी रुचि और गहरी हुई. अब वह चाहती हैं कि दुनिया के हर बच्चे, खासकर लड़कियों और वंचित वर्गों को शिक्षा और किताबों तक बेहतर पहुंच मिले. वह दिव्यांग बच्चों के साथ काम करने के अलावा नेपाल जैसे एशियाई देशों में किताबें इकट्ठा करने और जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाने की योजना भी बना रही हैं.
101 देशों के युवाओं से जुड़ा Literacy Programme
अदिति को World Literacy Foundation के एक वैश्विक कार्यक्रम में जापान का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेदारी मिली है. इस कार्यक्रम में 101 देशों के करीब 900 युवा शामिल हैं, जिनकी उम्र 16 से 25 वर्ष के बीच है. फाउंडेशन के अनुसार, यह कार्यक्रम पिछले 12 वर्षों से चल रहा है, लेकिन जापान से किसी युवा को पहली बार Literacy Ambassador बनाया गया है.
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अदिति के लिए साक्षरता का मतलब सिर्फ पढ़ना नहीं
अदिति के मुताबिक साक्षरता को केवल पढ़ने और लिखने की क्षमता तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. उनके लिए यह ऐसी ताकत है, जो व्यक्ति के सामने नए अवसरों के दरवाजे खोलती है. उनका मानना है कि प्रतिभा और क्षमता होने के बावजूद अगर किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त साक्षरता नहीं है, तो वह अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाएगा.
सोशल मीडिया के दौर में पढ़ने की आदत क्यों जरूरी?
अदिति खुद मानती हैं कि आज के युवाओं के आसपास सोशल मीडिया और स्मार्टफोन जैसे कई आकर्षण मौजूद हैं. ऐसे में किताब उठाने की तुलना में फोन देखना ज्यादा आसान लगता है. वह युवाओं को सलाह देती हैं कि पढ़ने की शुरुआत किसी कठिन या क्लासिक किताब से करना जरूरी नहीं है. बस ऐसी किताब चुनें जो आपको वास्तव में पसंद हो और आपके नजरिए को थोड़ा और व्यापक बनाए.