AI and IIT Degree: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने सीखने और जानकारी हासिल करने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है. आज कुछ ही सेकंड में किसी भी विषय की जानकारी AI टूल्स के जरिए मिल जाती है. ऐसे में छात्रों के मन में एक बड़ा सवाल उठ रहा है क्या अब भी IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए वर्षों की मेहनत करना उतना ही जरूरी है?
इसी सवाल पर IIT बॉम्बे के पूर्व छात्र और स्टार्टअप अनहद के सह-संस्थापक एवं CEO शिखर अग्रवाल ने अपनी राय साझा की है. उनका मानना है कि किसी बड़े संस्थान की सबसे बड़ी ताकत उसका नाम या डिग्री नहीं, बल्कि वहां का माहौल और प्रेरित लोगों का साथ होता है.
AI ने बदला शिक्षा का स्वरूप
शिखर अग्रवाल का कहना है कि AI ने ज्ञान तक पहुंच को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है. पहले जिन विषयों को समझने के लिए महंगी किताबों, कोचिंग या कॉलेज की जरूरत पड़ती थी, अब वही जानकारी कुछ क्लिक में उपलब्ध हो जाती है. यही वजह है कि आज कई छात्र यह सोचने लगे हैं कि क्या प्रतिष्ठित कॉलेजों की डिग्री का महत्व पहले जैसा बना रहेगा.
IIT से सबसे बड़ी सीख क्लासरूम नहीं, लोग थे
IIT बॉम्बे से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में BTech करने वाले शिखर अग्रवाल का मानना है कि उनकी सबसे बड़ी सीख लेक्चर हॉल या पाठ्यक्रम से नहीं मिली. उनके अनुसार, असली बदलाव उन लोगों के बीच रहने से आया, जो लगातार बड़े सपने देखते थे, नए विचारों पर काम करते थे और एक-दूसरे को बेहतर बनने के लिए प्रेरित करते थे. उनका कहना है कि ऐसे वातावरण में रहने से सोच का दायरा अपने आप बढ़ता है और व्यक्ति अपनी क्षमता को नए नजरिए से देखना सीखता है.
गोल्डफिश की कहानी से समझाया माहौल का महत्व
अपने विचार को समझाने के लिए शिखर ने गोल्डफिश का उदाहरण दिया. उन्होंने बताया कि यदि गोल्डफिश छोटे बर्तन में रहती है तो उसका विकास सीमित रहता है, लेकिन बड़े तालाब में पहुंचने पर उसका आकार और क्षमता दोनों बढ़ जाते हैं. उनके मुताबिक, IIT बॉम्बे भी ऐसा ही एक “तालाब” था, जहां हजारों प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी छात्रों के बीच रहकर उनकी सोच और आत्मविश्वास का विस्तार हुआ.
AI जानकारी दे सकता है, लेकिन माहौल नहीं
शिखर का मानना है कि AI किसी भी विषय का जवाब दे सकता है, लेकिन वह ऐसा वातावरण तैयार नहीं कर सकता जहां लोग एक-दूसरे को लगातार चुनौती दें, प्रेरित करें और आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करें. उनके अनुसार, किसी संस्थान की असली ताकत उसकी इमारतें या ब्रांड नहीं, बल्कि वहां मौजूद लोग, विचारों का आदान-प्रदान और सहयोग की संस्कृति होती है.
डिग्री से ज्यादा महत्वपूर्ण है नेटवर्क और अनुभव
लंबे समय से IIT जैसे संस्थानों की पहचान शानदार प्लेसमेंट और बड़े सैलरी पैकेज से जुड़ी रही है. हालांकि शिखर अग्रवाल का मानना है कि इन संस्थानों की वास्तविक ताकत वहां बनने वाले रिश्ते, नेटवर्क, सहयोग और बौद्धिक माहौल में छिपी होती है, जो करियर के हर चरण में साथ रहता है.
AI ने शिक्षा की दुनिया में बड़ा बदलाव जरूर किया है, लेकिन मानवीय अनुभव, प्रेरक माहौल और मजबूत नेटवर्क की जगह अब भी कोई तकनीक नहीं ले सकी है. प्रतिष्ठित संस्थान केवल डिग्री नहीं देते, बल्कि ऐसा वातावरण भी प्रदान करते हैं जो व्यक्ति की सोच, आत्मविश्वास और भविष्य को नई दिशा देता है. यही कारण है कि AI के दौर में भी अच्छे कॉलेजों का महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, बल्कि उनका वास्तविक मूल्य अब पहले से अधिक स्पष्ट होकर सामने आ रहा है.
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