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भले अरविंद केजरीवाल नहीं चाहते थे लड़ना, लेकिन जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने लिया ऐसा फैसला, अब एक नहीं 3 वकील करेंगे पैरवी

Delhi High Court Kejriwal Case: दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि वह तीन सीनियर वकीलों को एमिकस क्यूरी नियुक्त करेंगी क्योंकि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया है.

By: Shristi S | Last Updated: May 5, 2026 4:03:33 PM IST



Arvind Kejriwal Case in Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह दिल्ली आबकारी नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को बरी किए जाने को चुनौती देने वाले मामले में अपनी मदद के लिए तीन सीनियर वकीलों को एमिकस क्यूरी (अदालत के सलाहकार) के तौर पर नियुक्त करेगा.

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह निर्देश तब दिया, जब केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (AAP) के दो अन्य नेताओं मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर उनके सामने होने वाली सुनवाई का बहिष्कार करने का फैसला किया.

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने क्या कहा?

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि मैं 8, 18 और 19 तारीख के लिए एक सीनियर वकील को एमिकस के तौर पर नियुक्त करूंगी. इसलिए यह उचित होगा कि एमिकस की नियुक्ति हो जाने के बाद ही मैं CBI की दलीलें सुनूं. कोर्ट ने कहा कि एमिकस की नियुक्ति शुक्रवार को होगी, जो सुनवाई की अगली तारीख है.

केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने इससे पहले जज से खुद को इस मामले से अलग करने (recusal) की मांग की थी. हालांकि, जस्टिस शर्मा ने 20 अप्रैल को उनकी अर्जी खारिज कर दी थी. जज ने कहा था कि किसी राजनेता को अविश्वास फैलाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती और उनकी सुनवाई से खुद को अलग करने की मांग वाली अर्जी का मतलब न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करना है.

2022 में मामला सामने आया था

यह मामला 2022 में सामने आया था, जब CBI ने एक FIR दर्ज की थी. FIR में आरोप लगाया गया था कि 2021-22 की दिल्ली आबकारी नीति में हेरफेर किया गया था, ताकि दिल्ली में शराब के कारोबार पर कुछ लोगों का एकाधिकार (monopoly) और गुटबंदी (cartelisation) हो सके. जांच एजेंसी ने कहा कि इस नीति में हेरफेर के चलते AAP और उसके नेताओं को शराब निर्माताओं से रिश्वत (kickbacks) मिली थी। बाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत एक मामला दर्ज किया.

इसके बाद विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया, जिसकी कुछ हलकों में यह कहकर आलोचना की गई कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं. आरोप लगाया गया था कि नीति बनाने के चरण में ही AAP नेताओं – जिनमें सिसोदिया और केजरीवाल भी शामिल थे तथा कुछ अन्य अज्ञात और बेनाम निजी व्यक्तियों/संस्थाओं द्वारा एक आपराधिक साजिश रची गई थी.

आरोप था कि इस साजिश के तहत नीति में जानबूझकर कुछ खामियां छोड़ी या पैदा की गई थीं. दावा किया गया कि इन खामियों का मकसद टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद कुछ शराब लाइसेंसधारियों और साजिशकर्ताओं को फायदा पहुंचाना था. इस साल 27 फरवरी को एक ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल और 22 अन्य आरोपियों को इस मामले से बरी कर दिया था. CBI ने इस आदेश को चुनौती दी और अभी जस्टिस शर्मा इसकी सुनवाई कर रही हैं.

9 मार्च को नोटिस जारी किया गया

9 मार्च को, जस्टिस शर्मा ने इस मामले में नोटिस जारी किया और उस CBI अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए ट्रायल कोर्ट के निर्देश पर रोक लगा दी, जिसने इस केस की जांच की थी. जस्टिस शर्मा ने यह भी शुरुआती तौर पर पाया कि ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में जो कुछ टिप्पणियां की थीं, उनमें से कुछ गलत थीं. उन्होंने ट्रायल कोर्ट को आगे यह निर्देश भी दिया कि वह PMLA की कार्यवाही को टाल दे, जो CBI के केस पर आधारित है.

इसके बाद, केजरीवाल और अन्य आरोपियों – सिसोदिया, पाठक, विजय नायर, अरुण पिल्लई और चनप्रीत सिंह रायत – ने जस्टिस शर्मा से खुद को इस मामले से अलग करने (recusal) के लिए अर्जी दी. जस्टिस शर्मा ने इस अर्जी को खारिज कर दिया और फैसला किया कि वह इस मामले की सुनवाई जारी रखेंगी. इसके बाद, केजरीवाल, सिसोदिया और पाठक ने जस्टिस शर्मा के सामने होने वाली कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया.

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