Home > क्राइम > Babu Reshim: गुजारे के लिए होटलों में धोएं बर्तन, फिर बना BRK गैंग का बड़ा नाम… लॉक-अप में कैसे खत्म हुआ इस गैंगस्टर का सफर?

Babu Reshim: गुजारे के लिए होटलों में धोएं बर्तन, फिर बना BRK गैंग का बड़ा नाम… लॉक-अप में कैसे खत्म हुआ इस गैंगस्टर का सफर?

Babu Reshim Story: आज हम जानेंगे मुंबई के उस गैंगस्टर के बारे में जिसने कभी अपने गुजारे के लिए होटलों में जूठे बर्तन धोए और देखते ही देखते शहर में अपना एक गैंग बना लिया. फिर कैसे बाबू रेशिम की हत्या जेल के लॉक-अप में हुई.

By: Shristi S | Published: October 3, 2026 4:26:46 PM IST



Babu Reshim BRA Gang: मुंबई के अंडरवर्ल्ड की कहानियों में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका सफर जितना ऊपर जाता है, अंत उतना ही खौफनाक होता है. बाबू गोपाल रेशिम की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी. कभी होटल में बर्तन साफ करने वाला यह युवक आगे चलकर मुंबई की कुख्यात BRA गैंग के प्रमुख चेहरों में शामिल हुआ. लेकिन जिस पुलिस लॉक-अप को उसके लिए सुरक्षित जगह माना जा रहा था, आखिर वही उसकी जिंदगी का आखिरी ठिकाना बन गया और 5 मार्च 1987 की सुबह हुई उस वारदात ने मुंबई पुलिस और जेल सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए.

होटल में बर्तन धोने से शुरू हुआ रेशिम का सफर

बाबू रेशिम का शुरुआती जीवन आर्थिक परेशानियों के बीच गुजरा. वह होटल में बर्तन साफ करने का काम करता था. बाद में उसने मझगांव डॉक की कैंटीन में नौकरी की, जहां उसकी मुलाकात मजदूर यूनियन से जुड़े लोगों से हुई. इसी दौर में उसका झुकाव अपराध की दुनिया की तरफ बढ़ा और वह छोटे-मोटे अपराधों से आगे निकलकर वसूली और दबदबे की गतिविधियों में शामिल होने लगा.

कैसे बनी BRA गैंग?

1970 के दशक में बाबू रेशिम और रमा नाइक साथ आए. बाद में अरुण गवली भी इस नेटवर्क से जुड़ गए. तीनों के नाम के पहले अक्षरों से इस BRA गैंग- Babu Reshim, Rama Naik और Arun Gawli कहा गया. 1980 के दशक में इस गैंग का प्रभाव मुंबई के मध्य हिस्सों और मिल इलाकों तक बढ़ा.

1982 की मिल हड़ताल के दौरान रेशिम का नाम खास तौर पर चर्चा में आया. रिपोर्टें के मुताबिक, उस पर मजदूरों को धमकाकर काम कर वापस भेजने के लिए दबाव बनाने का आरोप लगा था. आगे चलकर गैंग ने वसूली और संरक्षण के नाम पर पैसे लेने जैसे गतिविधियों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया.

आखिर लॉक-अप में कैसे हुई रेशिम की हत्या?

1987 में बाबू रेशिम को एक हत्या के प्रयास के मामले में गिरफ्तार किया गया और वह पुलिस हिरासत में था. 5 मार्च की तड़के हथियारों और बमों से लैस हमलावर जैकब सर्किल स्थित पुलिस लॉक अप तक पहुंचे. अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक, हमलावरों ने बम फेंके, गोलीबारी की और सेल नंबर 1 तक पहुंचकर रेशिम पर गोलियां चलाईं. उसकी मौके पर ही मौत हो गई. इस हमले में पुलिसकर्मी भी घायल हुए, जिनमें से एक की बाद में मौत हो गई.

इस हमले की जांच और मुकदमे में कई गवाहों के बयान दर्ज हुए. 1997 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने मामले पर फैसला सुनाते हुए हमले को योजनाबद्ध बताया और उपलब्ध सबूतों की विस्तार से समीक्षा की. इस तरह होटल की रसोई से शुरू हुआ बाबू रेशिम का सफर मुंबई अंडरवर्ल्ड तक पहुंचा, लेकिन उसका अंत किसी गैंगवार में सड़क पर नहीं, बल्कि पुलिस लॉक-अप के अंदर हुआ.

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