Chhattisgarh Gangaram Crocodile: अगर कोई आपसे कहे कि एक मगरमच्छ की मौत पर पूरा गांव शोक में डूब गया, घरों में चूल्हे नहीं जले और उसे इंसान की तरह अंतिम विदाई दी गई, तो शायद यकीन करना मुश्किल हो. लेकिन छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के बावा मोहतारा गांव की कहानी कुछ ऐसी ही है. यहां रहने वाला गंगाराम कोई आम मगरमच्छ नहीं था.
गांववालों के मुताबिक, उसने करीब 130 साल तक गांव के तालाब में डेरा जमाए रखा, कई पीढ़ियों को आते-जाते देखा और कभी किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाया. यही वजह है कि उसकी मौत के सात साल बाद भी लोग उसे भूले नहीं है. अब उसकी कहानी गांव की चौपाल से निकलकर देशभर के बच्चों की किताबों तक पहुंचने जा रही है.
गांववालों के लिए रहा परिवार का सदस्य
बावा मोहतारा के गांव के बीचों-बीच मौजूद तालाब में रहने वाले मगरमच्छ को गांववालों ने प्यार से गंगाराम नाम दिया था. स्थानीय लोगों का कहना है कि वह दशकों तक उसी तालाब में रहा और धीरे-धीरे गांव की पहचान बन गया. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि महिलाएं रोज उसी तालाब से पानी भरती थीं, किसान अपने मवेशियों को वहीं पानी पिलाते थे और बच्चे किनारे खेलते थे. हैरानी की बात यह रही कि गांव वालों के अनुसार गंगाराम ने कभी किसी इंसान पर हमला नहीं किया. समय के साथ इंसानों और इस विशाल मगरमच्छ के बीच एक अनकहा भरोसा बन गया.
130 साल तालाब में किया राज़
स्थानीय लोगों के अनुसार, गंगाराम करीब 130 सालों तक तालाब में रहा. इस दौरान गांव की कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन तालाब का यह पुराना पहरेदार वहीं मौजूद रहा. इसी वजह से वह सिर्फ एक वन्यजीव नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन गया. हालांकि, उसकी उम्र को लेकर कोई आधिकारिक वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है, लेकिन गांववालों की स्मृतियों और स्थानीय परंपराओं में गंगाराम की लंबी मौजूदगी आज भी दर्ज है.
जब गंगाराम की मौत पर रो पड़ा था पूरा गांव
साल 2019 में गंगाराम की मौत हो गई. यह खबर पूरे इलाके में आग की तरह फैल गई और गांववालों ने उसे किसी अपने की तरह विदाई दी. लोगों के अनुसार, उस दिन गांव में शोक का माहौल था. गंगाराम का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया और कई ग्रामीणों का दावा है कि शोक के कारण उस दिन घरों में चूल्हे तक नहीं जले.
अब NCERT की किताबों में पहुंचेगी गंगाराम की कहानी
गंगाराम की कहानी अब सिर्फ गांव की यादों तक सीमित नहीं रहेगी. NCERT ने इसे अपने पाठ्यक्रम में ‘My India! – A Bond Between Humans and Animals’ (मेरा भारत!- इंसानों और जानवरों के बीच एक रिश्ता) शीर्षक के अंतर्गत शामिल किया है. इसके जरिए छात्रों को यह समझाने की कोशश की जाएगी कि कुछ समुदायों ने प्रकृति और वन्यजीवों के साथ किस तरह सह-अस्तित्व का रिश्ता बनाया. इस पहल के बाद गंगाराम की कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेगी और एक छोटे से गांव की यह अनोखी काहनी राष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाएगी.