Dhamtari farmer case: धमतरी जिले के कुरुद अनुविभाग से सामने आया एक मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है. ग्राम थूहा के किसान तोरन सिंह साहू को अपने खेत की मेड़ पर लगे 16 साजा पेड़ों की अवैध कटाई और फसल नुकसान के मामले में करीब 8 वर्ष 6 माह तक न्यायालयों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े, लेकिन आखिरकार उसे न पेड़ों का मुआवजा मिला और न ही फसल नुकसान की भरपाई. लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एसडीएम न्यायालय कुरुद ने आरोपियों पर केवल 16 हजार रुपये का जुर्माना लगाया, जो शासन के खाते में जमा होगा.
डिप्टी रेंजर सहित अन्य पर पेड़ कटाई का आरोप
मामले के अनुसार किसान तोरन सिंह ने शिकायत दर्ज कराई थी कि बहोरन मुर्रे, रेवेंद्र सिंह, ऐरावत मुर्रे सहित अन्य लोगों ने उसकी भूमि खसरा नंबर 75/1 की मेड़ पर लगे साजा प्रजाति के 16 हरे-भरे पेड़ों को बिना अनुमति काटकर ट्रैक्टर क्रमांक CG 05 AD 3017 से परिवहन किया. किसान ने आरोप लगाया कि इस दौरान उसकी सरसों की फसल भी पूरी तरह बर्बाद हुई. सबसे बड़ा सवाल यह है कि आरोपियों में शामिल ऐरावत मुर्रे कुरुद में ही वन विभाग में डिप्टी रेंजर के पद पर पदस्थ हैं, एक ऐसा अधिकारी जिस पर स्वयं पेड़ो की रक्षा की जिम्मेदारी हो का नाम के चलते पूरे मामले में प्रभाव, दबाव.और निष्पक्षता से जांच न होंने की चर्चा लगातार होती रही.
साक्ष्य के अभाव में बंद हुआ केस, फिर दोबारा खुली फाइल
प्रारंभिक जांच में 16 पेड़ों के ठूंठ मिलने की पुष्टि हुई थी, लेकिन दिसंबर 2021 में एसडीएम न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में प्रकरण को नस्तीबद्ध कर दिया. इसके बाद किसान ने अपर कलेक्टर धमतरी में अपील की, जहां अप्रैल 2023 में आदेश को त्रुटिपूर्ण बताते हुए पुनः सुनवाई के निर्देश दिए गए. बाद में मामला आयुक्त रायपुर संभाग पहुंचा, जहां जुलाई 2025 में आरोपियों की अपील भी खारिज कर दी गई. इसके बाद दोबारा सुनवाई करते हुए फरवरी 2026 में एसडीएम न्यायालय ने माना कि 16 साजा वृक्षों की कटाई बिना प्रशासनिक अनुमति के की गई थी और यह छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 240, 241 एवं 253 का उल्लंघन है.
एसडीएम बोले- प्रावधानों के तहत विधि अनुसार कार्रवाई की गई
एसडीएम कुरुद का कहना है कि प्रकरण में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के तहत विधि अनुसार कार्रवाई की गई है. न्यायालय द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर निर्णय पारित किया गया है.
जुर्माना शासन को, किसान अब भी राहत से वंचित
न्यायालय ने प्रति वृक्ष 1,000 रुपये के हिसाब से कुल 16,000 रुपये का जुर्माना आरोपियों पर लगाया, लेकिन यह राशि शासन के खाते में जमा होगी. आदेश में कहीं भी पीड़ित किसान को आर्थिक क्षतिपूर्ति देने का उल्लेख नहीं किया गया. वर्षों तक चली अदालती लड़ाई में किसान का समय, पैसा और मानसिक पीड़ा भी अनदेखी रह गई. अब स्थानीय ग्रामीणों और किसान संगठनों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि जब पेड़ कटाई और नियम उल्लंघन सिद्ध हो चुका है, तो आखिर पीड़ित किसान को उसका हक क्यों नहीं मिला?
न्याय नहीं, सिर्फ तारीखें मिलीं- पीड़ित किसान
पीड़ित किसान तोरन सिंह का कहना है कि उसने न्याय व्यवस्था पर भरोसा कर वर्षों तक संघर्ष किया, लेकिन उसे “न्याय नहीं, सिर्फ तारीखें” मिलीं. आर्थिक और मानसिक रूप से टूट चुके किसान ने प्रशासन से वास्तविक नुकसान की भरपाई और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है. वहीं स्थानीय स्तर पर अब यह मामला प्रशासनिक संवेदनशीलता और प्रभावशाली लोगों के खिलाफ कार्रवाई की निष्पक्षता को लेकर चर्चा का विषय बन गया है.
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