UPSC Coaching News: केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने प्रतिष्ठित IAS कोचिंग संस्थान ‘वजीराम एंड रवि IAS स्टडी सेंटर LLP’ पर 7 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. यह कार्रवाई भ्रामक विज्ञापन देने और UPSC सिविल सेवा परीक्षा (CSE) में छात्रों की सफलता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के आरोपों के बाद की गई. यह निर्णय CCPA की मुख्य आयुक्त निधि खरे और आयुक्त अनुपम मिश्रा द्वारा विस्तृत जांच के बाद लिया गया. जांच में संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट और विज्ञापनों में किए गए बड़े दावों की गहन समीक्षा की गई.
उपभोक्ता मामले मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, संस्थान ने दावा किया था कि UPSC टॉप 10 में से 8 और टॉप 50 में से 37 उम्मीदवार उसके छात्र रहे हैं. साथ ही यह भी प्रचार किया गया कि हर साल UPSC से चयनित 30 प्रतिशत से अधिक अधिकारी इसी संस्थान से आते हैं. इन दावों ने लाखों अभ्यर्थियों और उनके परिवारों के बीच यह धारणा बनाई कि संस्थान के पूर्ण कोर्स ही सफलता की मुख्य वजह हैं. यही बात जांच का मुख्य विषय बनी.
जांच में सामने आया असली सच
CCPA की जांच में पाया गया कि वास्तविकता इन दावों से काफी अलग थी. टॉप रैंकर्स में से अधिकांश उम्मीदवार केवल संस्थान के मुफ्त ‘इंटरव्यू गाइडेंस प्रोग्राम (IGP)’ से जुड़े थे, न कि इसके महंगे फुल-टाइम कोचिंग कोर्स से. रिपोर्ट के अनुसार टॉप 10 में से 8 में से 7 उम्मीदवार केवल IGP से जुड़े थे. इसी तरह टॉप 50 में से 37 में से 29 छात्रों ने भी सिर्फ इंटरव्यू गाइडेंस प्रोग्राम में हिस्सा लिया था. यह पैटर्न कई वर्षों तक लगातार देखा गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि संस्थान द्वारा दिखाए गए आंकड़े अधूरे और भ्रमित करने वाले थे.
IGP बनाम फुल कोचिंग का अंतर
जांच में यह भी सामने आया कि इंटरव्यू गाइडेंस प्रोग्राम (IGP) केवल उन उम्मीदवारों के लिए होता है, जो पहले ही UPSC के प्रीलिम्स और मेन्स चरण पास कर चुके होते हैं. यानी वे पहले से ही चयन प्रक्रिया के अंतिम चरण में पहुंच चुके होते हैं. इसके बावजूद, संस्थान ने अपने विज्ञापनों में इन सफल उम्मीदवारों को अपने पूर्ण कोचिंग कार्यक्रम से जोड़कर प्रस्तुत किया. यही तथ्य छिपाने को CCPA ने भ्रामक विज्ञापन माना.
कानून के तहत कार्रवाई
CCPA ने इस मामले को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 2(28)(iv) के तहत भ्रामक विज्ञापन का मामला माना. साथ ही इसे उपभोक्ताओं के ‘सूचित होने के अधिकार’ का उल्लंघन भी बताया गया. इस कार्रवाई के बाद शिक्षा क्षेत्र में विज्ञापन पारदर्शिता और संस्थानों की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है.